खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली … Khopa Pare Pati Mare Turi Rang Rely

खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली

 

आओ सुनथन श्री शेख हुसैन जी के गाए गीत …


आ ~ ~ ~ आ
आ ~ ~ ~ आ

खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
छुनुर छुनुर पैरी~~ हो
छुनुर छुनुर पैरी बाजे गली गली देखे
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली

रद्दा ल रेंगे खोरे ल डहके
रद्दा ल रेंगे खोरे ल डहके
गोरी खोचें है करौंदा गली म महके देखे

खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
छुनुर छुनुर पैरी~~ हो
छुनुर छुनुर पैरी बाजे गली गली देखे
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली

चंदा ऊबे अउ चंदैनी छिटके
चंदा ऊबे अउ चंदैनी छिटके
तोर कनिहा ले चुंदी नागिन लटके-रे देखे
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली

पहिने ल लुगरा देखे ल दरपन
पहिने ल लुगरा देखे ल दरपन
तोला खुल के बिराजे चांदी के करधन देखे

खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
छुनुर छुनुर पैरी~~ हो
छुनुर छुनुर पैरी बाजे गली गली देखे
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली
खोपा पारे पाटी मारे टुरी रंग-रेली


गायन शैली : ददरिया
गीतकार : संत मसीह दास
रचना के वर्ष : ?
संगीतकार : ?
गायन : शेख हुसैन
एल्बम : ?
संस्‍था/लोककला मंच : संगम आर्केस्ट्रा

 

शेख हुसैन

 

यहाँ से आप MP3 डाउनलोड कर सकते हैं

गीत सुन के कईसे लागिस बताये बर झन भुलाहु संगी हो …

13s टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राहुल सिंह
    जन 22, 2012 @ 07:52:14

    बढि़या गीत सुरता कराए ह.
    छत्‍तीसगढ़ी लिखे म अड़चन के एक नमूना ‘आओ सुनथन श्री शेख हुसैन जी के गाए गीत …’ म सुनथन के उच्‍चारण संग हे, बोले त ए शब्‍द ह सुनत+हन के संधि असन बोलाथे, लेकिन लिखे ल खास कर के नया आदमी पढि़ही त सु+नथन कस पढि़ही. जइसे अगर ‘तो ल’ लिखे जाय त ठीक लेकिन जोड़ के तोल या तोला लिख देहे म नाप-तोल कस लगथे, जबकि उच्‍चारण तोलs आय.

    Reply

    • cgsongs
      जन 22, 2012 @ 10:20:28

      सर्वप्रथम राहुल जी लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए धन्यवाद !

      राहुल जी, जैसा कि आपने “आओ सुनथन श्री शेख हुसैन जी के गाए गीत …” को छत्‍तीसगढ़ी लिखने में अड़चन का नमूना और “सुनथन, बोले त ए शब्‍द ह सुनत+हन के संधि असन बोलाथे” कहा है।

      हमारी भाषाओं (भारतीय भाषाओं) में एक समान लगने वाले शब्दों का अर्थ वास्तविक परिप्रेक्ष्य में अलग अलग होता है..
      सुनत+हन = सुनत हन = गाना चल रहा है और हम गाना सुन रहे। (वर्तमान काल)
      सुनथन = चलिए अब गाना सुनते हैं। (भविष्य काल)

      उदाहरण स्वरुप – आप और मैं साथ बैठे हुये है और मैं आपसे कहता हूँ “चाचा जी चलो गाना सुनते हैं”, इसे छत्‍तीसगढ़ी में कहें तो “चल ग कका गाना सुनथन” (यह उदा.1 है)

      परन्तु जैसा उदहारण अपने टिप्पणी में दिया उसके अनुसार कहू तो ये कुछ इस तरह से सुनाई पड़ेगा “चल ग कका गाना सुनत हन” (यह उदा.2 है)

      उदा.2 में ना केवल इसने भाषा का सौंदर्य खोया बल्कि अर्थ भी विकृत हो गया… तो आप ही बताये कि कौन सा सही हैं?

      दूसरी बात आपने उच्‍चारण के लिये बताई कि ‘तो ल’ लिखे जाय त ठीक लेकिन जोड़ के तोल या तोला लिख देहे म नाप-तोल कस लगथे, जबकि उच्‍चारण तोलऽ आय।

      परन्तु सामान्यतः ‘तो ल’ का प्रयोग नहीं होता है जब भी आप किसी को कहेंगे तो पूर्ण रूपेण ‘तो-ला’ उच्‍चारण आता है ना कि ‘तो ल’, आप अपने मन में कह कर देखिये…

      यह तो हुयी उच्‍चारण कि बात, अब जैसा आपने कहा कि “तोला लिख देहे म नाप-तोल कस लगथे” तो यह तो मशीन (कंप्यूटर) पढ़े तो समझ आता है कि तोला को नाप-तोल जैसा समझ रहा है… परन्तु कहीं लिखने में ‘तो-ला’ के बजाय “तोला” लिख भी दिया जाये तो भी कोई समस्या नहीं है क्योंकि पाठक कोई भी चीज़ लगातार (flow में) पढता है ना कि प्रत्येक शब्दों को पढकर उसके एक शब्द के अर्थ के बारे में सोचे फिर अगला पढ़े… जब आप कोई भी चीज़ flow में पढते है तो उसके वास्तविक अर्थ को ही समझते हैं।

      Reply

  2. Saralhindi
    जन 22, 2012 @ 10:34:44

    very good….
    Chhhatisgadhi have their own speaking language but not writing scrip.Why?

    Reply

  3. digen
    जन 23, 2012 @ 12:38:01

    varnan soundarya ka ,
    lagan ek utsah ka .
    tarif creation ka
    barhe raho duniya ma

    Reply

  4. vitendra panigrahi
    जन 25, 2012 @ 13:08:30

    bahut badhiya gana sunaye . tekar bar dhanyavaad

    Reply

  5. एमन दास मानिकपुरी
    जन 26, 2012 @ 11:59:52

    छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विशेषता का सौंदर्य यहां के आभूषणों में निहित है । उम्र-वर्ग, सामाजिक दरजे और भौगोलिक कारक से वर्गीकृत होता आभूषणों का भेद, इसे व्यापक और समृद्ध कर देता है । आभूषणों के रुप में सौंदर्य की कलात्मक चेतना का एक आयाम हजारों साल से जीवन्त है और आज भी सुनहरे-रुपहले पन्नों की तरह प्रकट है
    प्राकृतिक एवं अचल श्रृंगार ‘गोदना’ से इसका प्रारंभिक सिरा खुलता है । टोने-टोटके, भूत-प्रेतादि से बचाव के लिए गोदना को जनजातीय कुटुम्बों में रक्षा कवच की तरह अनिवार्य माना जाता रहा है । अधिकतर स्त्रियां, पवित्रता की भावना एवं सौंदर्य के लिये गोदना गोदवाती हैं । फूल-पत्ती, कांच-कौड़ी से होती रुपाकार के आकर्षण की यह यात्रा निरंतर प्रयोग की पांत पर सवार है। गुफावासी आदि मानव के शैलचित्रों, हड़प्पाकालीन प्रतिमाओं, प्राचीन मृण्मूर्तियों से लेकर युगयुगीन कलावेशेषों में विभिन्न आकार-प्रकार के आभूषणों की ऐतिहासिकता दिखाई पड़ती है ।

    छत्तीसगढ़ की संस्कृति में आभूषणों की पृथक पहचान व बानगी है । आदिम युग से ही प्राकृतिक और वानस्पतिक उत्पादन से लेकर सामाजिक विकास कम में बहुमूल्य धातु और रत्नों का प्रयोग होता रहा है । लकऱी, बांस, फूल, पत्ती, पंख, कांच, कौड़ी और पत्थर जैसे अपेक्षाकृत स्वाभाविक और आकर्षक लगने वाले मोलरहित पदार्थो को सौंदर्य-बोध से अपनाकर उनसे सजा संवरा गौरव, वस्तुतः आंतरिक सौंदर्य के फलस्वरुप है, वहीं बहुमूल्य धातुओं और रत्नों के विविध प्रयोग से छत्तीसगढ़ के आभूषण, राज्य की सास्कृतिक और कलात्मक गौरव गाथा के समक्ष प्रतीक हैं

    शरीर के विभिन्न हिस्सों में से सिर के परंपरागत आभूषण बाल, जूड़े व चोटी में धारण किए जाते है, जिसमें जंगली फूल, पंख, कौड़ियां, सिंगी, ककई-कंघी, मांगमोती, पटिया, बेंदी प्रमुख हैं । चेहरे पर टिकुली के साथ के साथ कान में ढार, तरकी, खिनवां, अयरिंग, बारी, फूलसंकरी, लुरकी, लवंग फूल, खूंटी, तितरी धारण की जाती है तथा नाक में फुल्ली, नथ, नथनी, लवंग, बुलाक धारण करने का प्रचलन है।
    सूंता, पुतरी, कलदार, सुंर्रा, संकरी, तिलरी, हमेल, हंसली जैसे आभूषण गले में शोभित होते है । बाजू, कलाई और उंगलियों में चूरी, बहुंटा, कड़ा, हरैया, बनुरिया, ककनी, नांमोरी, पटा, पहुंची, ऐंठी, मुंदरी (छपाही, देवराही, भंवराही) पहना जाता है । कमर में भारी और चौड़े कमरबंद-करधन पहनने की परंपरा है और पैरों में तोड़ा, सांटी, कटहर, चुरवा, चुटकी, बिछिया (कोतरी) पहना जाता है । बघनखा, ठुमड़ा, मठुला, मुंगुवा, ताबीज आदि बच्चों के आभूषण हैं, तो पुरुषों में चुरुवा, कान की बारी, गले में कंठी पहनने का चलन है ।
    शिशु जन्म, विवाह जैसे मांगलिक और संस्कार अवसरों पर आभूषण लेन-देन तथा धारण करने की प्रथा विशेष रुप से है । आभूषणों को श्रृंगार के अलावा ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष प्रयोजन और एक्यूप्रेशर-एक्यूपंचर से भी जोड़ा जाता है, स्त्री-धन तो यह है ही । छत्तीसगढ़ में प्रचलित सुवा ददरिया गीतों में आभूषणों का उल्लेख रोचक ढंग से हुआ है । एक लोकगीत में बेटी सुवा नाचने जाने के लिए अपनी मां से उसके विभिन्न आभूषण मांगती है- ‘दे तो दाई तोर गोड़ के पैरी, सुवा नाचे बर जाबोन’ और इसी क्रम में हाथ के बहुंटा, घेंच के सूंता, माथ के टिकली, कान के खूंटी, हाथ के ककनी आदि वर्णित है ।

    –एमन दास मानिकपुरी “अंजोर”

    Reply

  6. dr. ganesh. pandey
    जन 26, 2012 @ 19:43:45

    bahoot badiya pryas.garha garha badhai

    Reply

  7. ekaawajmithilake
    जन 29, 2012 @ 14:17:15

    Reblogged this on ekaawajmithilake.

    Reply

  8. धन्नू chhatttisgariya
    फ़र 02, 2012 @ 13:28:00

    bahut badiya………

    Reply

  9. kishor agrawal
    मार्च 09, 2012 @ 23:51:53

    ekhar sahi thhrav au dheer lgake kakhro barnan nai kare ja sake. abbad neek lagis re bhai. aap mn bdhai ke laik hao.

    Reply

  10. RUPESH
    मार्च 16, 2012 @ 15:26:35

    मोर द्वारा खिचे फोटो ला आप महत्व देव जेकरबर आप ला साधू वाद

    Reply

  11. lochan prasad dansena
    अप्रै 14, 2012 @ 15:58:34

    best

    Reply

  12. sanjay kumar
    अप्रै 20, 2012 @ 11:54:19

    superb . now i can smell the fragrance of chhatisgarhi soil from the thousand mile away evenfrom abroad thanku..

    Reply

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