जउन भुईयाँ खेले … Jaun Bhuiayan Khele

आज लाए है आपके लिए ‘घर द्वार’ फिल्म का पाँचवा व अंतिम गीत…

छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘घर द्वार’ के निर्माता ‘स्व.विजय कुमार पाण्डेय’ के सुपुत्र और ‘घर द्वार कला संघ’ के निर्देशक श्री जयप्रकाश पाण्डेय से हमें आप तक पहुँचाने के लिए ‘घर द्वार’ फिल्म के गानों का MP3 ऑडियो फाइल और फोटोग्राफ प्राप्त हुआ है।

जयप्रकाश पाण्डेय
जयप्रकाश पाण्डेय
पता : विजयबाड़ा, भनपुरी, रायपुर (छ.ग.), जे.के.फिल्मस्, रायपुर
मोबाइल : 9826108303, 9300008303

 

पेश है आज का गीत …

जउन भुईयाँ खेले, जउन भुईयाँ बाढ़े
जउन भुईयाँ खेले, जउन भुईयाँ बाढ़े
तउन भुईयाँ के अब छुटत
आज छुटत अँगना, छु~~ट~त अँगना

कलपत जियरा, तलपत हियरा
नैना~ नीर बहा~ए, नैना~ नीर बहा~ए
छूटे घर गाड़ी, गाँव खेत बारी~~~इ~इ~इ
परे पिंजरा म~~ बनके सुआ ना~
आज छुटत अँगना, छु~~टत अँगना~~

तुलसी उझरगे, गोंदा बगरगे
मोंगरा लागिस मुरझाए
छूटे अमरईया, नदिया अउ तरिया~~~आ~आ~
डरे पैजन, झिझकत कंगना~~
आज छुटत अँगना, छु~~ट~त अँगना
छु~~ट~त अँगना~~~


गायन शैली : ?
गीतकार : हरि ठाकुर
रचना के वर्ष : 1965-68
संगीतकार : जमाल सेन
गायन : सुमन कल्याणपुर
निर्माता : विजय कुमार पाण्डेय
फिल्म : घर द्वार
फिल्म रिलीज : 1971
संस्‍था : जे.के.फिल्मस्, रायपुर

‘घर द्वार’ फिल्म के अन्य गीत
सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे … Sun Sun Mor Maya Pira Ke Sangwari Re
गोंदा फुलगे मोरे राजा … Gonda Phoolege More Raja
झन मारो गुलेल … Jhan Maro Gulel
आज अध-रतिहा मोर फूल बगिया मा … Aaj Adh-ratiha Mor Phool Bagiyaa Ma

 

यहाँ से आप MP3 डाउनलोड कर सकते हैं

 

 

1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ रिलीज होने के साथ ही विवादों में घिर गई। इसकी वजह थी फिल्म में तथा-कथित उच्च वर्ण की नायिका का तथा-कथित निम्न वर्ग के नायक के साथ प्रेम प्रसंग और विवाह पर आधारित कथानक। यह अलग बात है कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस फिल्म को राष्ट्रीय एकता पर आधारित घोषित कर टैक्स फ्री किया था। खैर, ‘कहि देबे संदेस’ की बात फिर कभी आज बात ‘घर द्वार’ की…

घर द्वार

रायपुर से लगे भनपुरी गांव (अब यह रायपुर शहर का दो वार्ड में बंटा हिस्सा है) के मालगुजार स्व.श्री विक्रमादित्य पांडेय के सुपुत्र श्री विजय कुमार पांडेय छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति के सच्चे प्रतिनिधि थे। उनके मन में उस दौर में कुलबुलाहट थी कि छत्तीसगढ़ की सामंजस्य की संस्कृति और छत्तीसगढ़ी भाषा को प्रतिबिंबित करती एक पारिवारिक फिल्म बनाई जाए। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उनके पास धनाभाव तो नहीं था लेकिन उन्हें जरूरत थी एक बेहतरीन टीम की। उस दौर के बंबई (अब मुंबई) की फिल्मी दुनिया से श्री पांडेय न सिर्फ पूरी तरह वाकिफ थे बल्कि राजकपूर, देवानंद और दिलीप कुमार जैसी शख्सियतों से उनका अच्छा दोस्ताना था। श्री पांडेय ने छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘घर द्वार’ बनाने के लिए निर्देशन का दायित्व सौंपा रायपुर से जाकर बंबई में स्थापित हो चुके सुविख्यात निर्माता-निर्देशक श्री महेश कौल के सहायक रहे रायपुर निवासी (स्व.)श्री निर्जन तिवारी को।

स्व.विजय कुमार पाण्डेय
स्व.विजय कुमार पाण्डेय

फिल्म का कथानक
दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘घर द्वार’ मूलतः पारिवारिक कहानी पर आधारित है। फिल्म के निर्माता स्व.श्री विजय कुमार पांडेय के यशस्वी पुत्र श्री जयप्रकाश पांडेय और इस फिल्म का अहम हिस्सा रहे आज के वयोवृद्ध कलाकार श्री शिवकुमार दीपक द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार मुख्य किरदारों में दुलारी बाई (मां), कान मोहन (बड़ा भाई),रंजीता ठाकुर (बड़े भाई की पत्नी), जफर अली फरिश्ता (छोटा भाई), गीता कौशल (छोटे भाई की पत्नी), बसंत दीवान (मुनीम), इकबाल अहमद रिजवी (दलाल)और शिवकुमार दीपक (छोटे भाई की पत्नी का मामा) शामिल हैं। इसके अलावा सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि खुद स्व.श्री विजय पांडेय ने इस फिल्म में रायपुर के सेठ की संक्षिप्त भूमिका की है।

घर द्वार

घर द्वार

घर द्वार

कहानी के अनुसार केंद्रीय भूमिका के दोनों भाइयों के बचपन में ही पिता का देहांत हो जाता है। उनकी मां मेहनत-मशक्कत करके दोनों बेटों को जवान करती है। बड़ा बेटा खेती-किसानी और घरेलु जिम्मेदारियों के बीच अपना जीवन निर्वहन करता है। बड़ा भाई और मां मिलकर छोटे भाई को पढऩे शहर (रायपुर) भेजते हैं। यहां से पढ़ कर लौटा छोटा बेटा शहरी गलत संगतों की वजह से घर में कलह की वजह बनता है। वह शहर से ही विवाह करके गांव लौटता है, उसकी पत्नी के साथ पत्नी का धूर्त मामा भी साथ आता है। परिस्थितियां ऐसी बनती है कि घरेलु कलह के चलते बदहाली के दिन आ जाते हैं। इसी बीच मां भी दुनिया छोड़ जाती है। बड़ा भाई अपनी पत्नी को लेकर शहर आ जाता है और रिक्शा चलाकर पाई-पाई जोड़ता है। यहां उसकी मुलाकात एक सह्रदयी दानी सेठ से होती है, जो उसके पिता का पुराना दोस्त है। यह सेठ उसे सहारा देता है। कहानी नया मोड़ लेती है और गांव का पैतृक घर नीलाम होने को है। ऐसे में सेठ इस बड़े भाई को लेकर गांव पहुंचता है और आखिरी बोली खुद लगाते हुए घर को खरीदकर दोनों भाइयों को सौंप कर लौट जाता है।

‘घर द्वार’ फिल्म एक हद तक महबूब प्रोडक्शन की ‘मदर इंडिया’ से भी प्रभावित थी। जिसमें मां की भूमिका में उस वक्त बंबईया सिनेमा में स्थापित हो चुकी और सर्वाधिक व्यस्त कलाकार दुलारी बाई को लिया गया। बड़े बेटे की भूमिका निभाई ‘कहि देबे संदेस’ में नायक रह चुके कान मोहन ने और छोटे बेटे की भूमिका मिली उन दिनों रायपुर से बंबई जाकर अपनी पहचान बनाने संघर्ष कर रहे जफर अली फरिश्ता को। श्री फरिश्ता हालांकि बंबईया सिनेमा जगत में नायक के तौर पर स्थापित नहीं हो पाए, बाद में वह कुछ हिंदी फिल्मों के निर्माण से जुड़े रहे। फिल्म की नायिकाएं थी रंजीता ठाकुर और गीता कौशल थीं। साथ ही फिल्म में आज के कांग्रेसी नेता इकबाल अहमद रिजवी, कवियित्री नीलू मेघ के अलावा भगवती दीक्षित, भास्कर काठोटे, यशवंत गोविंद जोगलेकर, रामकुमार तिवारी, परवीन अहमद और ठाकुर दास आहूजा की भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं थी।

बड़ी बेटी को नाम दिया देवानंद ने

श्रीमती चंद्रकली पांडेय
श्रीमती चंद्रकली पांडेय

श्रीमती जयबाला तिवारी
श्रीमती जयबाला तिवारी

फिल्म से जुड़ी हुई बहुत सी यादें स्व. विजय कुमार पांडेय की पत्नी श्रीमती चंद्रकली पांडेय और बड़ी बेटी श्रीमती जयबाला तिवारी के जेहन में आज भी ताजा हैं। श्रीमती पांडेय ने अपनी यादों का पिटारा खोलते हुए शुरूआत की उनके परिवार में फिल्मी दुनिया के प्रभाव से। श्रीमती पांडेय ने बताया कि जिस वक्त उनकी बड़ी बेटी का जन्म हुआ श्री पांडेय बंबई में ही थे। वहां टेलीग्राम से खबर भेजी गई तो श्री पांडेय ने अपने कुछ दोस्तों को बुलाकर एक छोटी सी पार्टी रखी। जिसमें अभिनेता देवानंद, दिलीप कुमार और राजकपूर खास तौर पर आए थे। इसी पार्टी में देवानंद ने श्री पांडेय से कहा कि तुम्हारी बेटी को आशीर्वाद के तौर पर मैं एक नाम देना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि तुम्हारी बेटी का नाम जयबाला रखो। देवानंद की बात को शिरोधार्य करते हुए श्री पांडेय ने अपनी बेटी का नाम जयबाला पांडेय रखा। इसके बाद घर में ‘जय’ की परंपरा चल पड़ी। जिसके अनुसार हमारे सभी बच्चों के नाम के आगे ‘जय’ लगा है।

किशोर गाने वाले थे “गोंदा फुल गे…”
फिल्म से जुड़ी हुई यादें बांटते हुए श्रीमती चंद्रकली पांडेय ने बताया कि उनका फिल्म के गीतों की रिकार्डिंग के दौरान बंबई जाना नहीं हुआ था। वह सिर्फ शूटिंग की ही साक्षी रही हैं। स्व. पांडेय से सुनी हुई बातों के आधार पर श्रीमती पांडेय ने बताया कि 1965-67 का दौर ऐसा था जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी में अबोला चल रहा था। ऐसे में हम लोग चाह कर भी दोनों की आवाज में ‘सुन-सुन मोर मया पीरा के ’ और ‘आज अधरतिया’ जैसे युगल गीत नहीं रिकार्ड करवा पाए। तब सुमन कल्याणपुर की एकमात्र विकल्प थी,लिहाजा उन्होंने ही रफी साहब का साथ दिया। श्रीमती पांडेय के मुताबिक फिल्म का सबसे चर्चित गीत ‘गोंदा फुलगे मोर राजा’ पहले किशोर कुमार की आवाज में रिकार्ड किया जाना था। इसके लिए किशोर कुमार से अनुबंध भी हुआ था लेकिन ऐन वक्त पर किशोर कुमार का विदेश में प्रोग्राम तय हो गया, संभवत: मधुबाला के इलाज के सिलसिले में। ऐसे में संगीतकार जमाल सेन ने रफी साहब को यह धुन सुनाई तो उन्होंने इस गीत को गाने का प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया।

सरायपाली राजमहल में हुई शूटिंग
फिल्म की शूटिंग के संबंध में श्रीमती पांडेय ने बताया कि श्री पांडेय के लिए ‘घर द्वार’ एक महत्वकांक्षी फिल्म थी। इसलिए उन्होंने तकनीकी पक्ष के सारे विशेषज्ञ और सारे मुख्य कलाकार बंबई से बुलाए। फिल्म की मुख्य शूटिंग सरायपाली राजमहल में हुई। यहां पूरे डेढ़ साल तक अलग-अलग शेड्यूल में हुई तबतक बंबई की टीम रूकी रही। श्रीमती पांडेय के मुताबिक सरायपाली राजा श्री महेंद्र बहादुर सिंह ने भरपूर सहयोग और समर्थन दिया। राजा साहब ने अपना पूरा महल (पूजा घर को छोडक़र) फिल्म ‘घर द्वार’ के लिए समर्पित कर दिया। चूंकि पूरी यूनिट का सारा खर्च स्व. पांडेय ही उठा रहे थे, इसलिए उनके परिवार की जवाबदारी थी हर एक सदस्य की हर जरूरत का ध्यान रखना। श्रीमती पांडेय के मुताबिक ब्राह्मण होने की वजह से जब कभी यूनिट के लिए मांसाहारी भोजन बनता था तो श्री पांडेय अपने परिवार सहित यूनिट के दूसरे शाकाहारी लोगों को लेकर अलग बाड़े में चले जाते थे।

… और एकाएक फूटने लगे सारे बल्ब
महल के पूजा घर से जुड़ा एक अविश्वसनीय लेकिन आंखों देखा किस्सा सुनाते हुए श्रीमती पांडेय ने बताया कि राजा कुमार साहब की एक ही विनती थी कि महल के पूजा घर के आस-पास भी शूटिंग ना हो लेकिन कहानी के मुताबिक एक दृश्य पूजाघर का भी होना था। ऐसे में स्व. पांडेय ने किसी तरह राजा साहब को मना लिया। राजा साहब ने भी शर्त रखी कि शूटिंग तय वक्त में निपटनी चाहिए और पूजा घर के अंदर कोई भी चप्पल-जूते पहन कर नहीं जाएगा। इस शर्त को सबने मान तो लिया लेकिन बंबई से आई टीम ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। श्रीमती पांडेय के मुताबिक ज्यादातर लोग चप्पल-जूते पहन कर राजमहल के पूजा घर में सीधे चले गए। इसके बाद जैसे ही कैमरा ऑन किया गया, शूटिंग के लिए लगाई गई सारे बल्ब एकाएक धड़ा-धड़ फूटने लगे। श्रीमती पांडेय के मुताबिक इस अद्भुत घटना के दौरान ज्यादातर लोग तुरंत वहां से भाग खड़े हुए। मुंबई से मंगाई गई तमाम महंगे बल्ब का एक के बाद एक फूटने से पांडेय जी को उस वक्त हजारों का नुकसान हुआ था। इसके बावजूद पांडेय जी ने बंबई से दूसरी लाइटें मंगाई और कुछ दिन बाद मंदिर की पवित्रता को बरकरार रखते हुए शूटिंग पूरी की।

दिलीप कुमार ने ऐसा ‘घर द्वार’ के प्रचार के लिए किया
श्रीमती पांडेय ने बताया कि ‘घर द्वार’ और दिलीप कुमार की ‘गोपी’ फिल्म लगभग साथ-साथ ही पूरी होनी थी और रिलीज की तारीख भी आस-पास की थी। ऐसे में दिलीप कुमार ने श्री पांडेय को एक दिन अपनी फिल्म ‘गोपी’ की शूटिंग में बुलवाया और एक दृश्य में रायपुर रेलवे स्टेशन का सेट बनवाया और एक डायलॉग खास तौर पर शामिल करवाया जिसमें रायपुर वाली मौसी का उल्लेख है। दिलीप कुमार ने यह सब इसलिए किया ताकि ‘गोपी’ फिल्म के इस दृश्य की वजह से ‘घर द्वार’ फिल्म के प्रमोशन में मदद मिल जाए। श्रीमती पांडेय ने बताया कि फिल्म 1971 में रायपुर के प्रभात टॉकीज में रिलीज हुई थी, जिसकी तारीख उन्हें याद नहीं है। इसके बाद 1984-85 तक यह फिल्म हर साल दो साल के अंतराल से रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई, रायगढ़, कोरबा दूसरे शहरों की टॉकीजों में लगती रही। टूरिंग टॉकीजों के जरिए मेला आदि में भी इस फिल्म का प्रदर्शन बखूबी हुआ।

जयबाला भी है संक्षिप्त भूमिका में
स्व. विजय कुमार पांडेय की बड़ी बेटी श्रीमती जयबाला तिवारी ने फिल्म ‘घर द्वार’ में बेहद संक्षिप्त भूमिका की है। तब जयबाला की उम्र छह या सात बरस की थी। फिल्म में उनकी भूमिका महज इतनी सी थी कि उन्हें नायिका रंजीता ठाकुर का हाथ पकड़ कर खेलते-कूदते हुए आगे बढऩा था। उनके हिस्से में कोई डायलॉग नहीं था। जयबाला ने यह छोटा सा दृश्य अपने पिता के कहने पर बेहद सहज ढंग से कर दिया। बचपन की यह याद श्रीमती जयबाला तिवारी के जहन में आज भी ताजा है। वह बताती हैं कि – बचपन की याद तो कभी भूली नहीं जा सकती। सरायपाली महल में हम बच्चे लोग उछल-कूद करते रहते थे। फिर वहीं हम लोगों ने बंबई से आए कलाकारों के साथ होली-दीवाली भी मनाई थी। श्रीमती तिवारी बताती हैं कि एक गीत ‘झन मारो गुलेल’ की शूटिंग राजमहल में हुई थी और इस गीत में नृत्य करती हुई नायिका का चेहरा आज भी उन्हे याद है।

कन्हैयालाल की जगह ली शिवकुमार दीपक ने
शिवकुमार दीपक

इस फिल्म में कुटिल मामा की भूमिका श्री शिवकुमार दीपक ने की है। फिल्म में उन्हें यह भूमिका मिलने और फिल्म की शूटिंग से जुड़ी यादें बांटते हुए श्री दीपक ने कुछ इस तरह से बताया -‘कही देबे संदेस’ की रिलीज के बाद ‘घर द्वार’ का निर्माण शुरू हुआ था। पटकथा के अनुसार ‘घर द्वार’ में कुटिल मामा की भूमिका के लिए निर्माता श्री विजय पांडेय और निर्देशक श्री निर्जन तिवारी ने मुंबई के सर्वाधिक सफल कलाकार श्री कन्हैयालाल से बात की थी। जो उस वक्त इस भूमिका के 50 हजार रूपए मांग रहे थे। यह रकम संभवतः फिल्म के मुख्य हीरो कान मोहन के पारिश्रमिक के बराबर थी। इसलिए श्री कन्हैया लाल से बात नहीं बन पा रही थी। चूंकि इस फिल्म के हीरो श्री कान मोहन इसके पहले बनी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ में मुख्य भूमिका में थे और उस फिल्म में मुझे भी अभिनय करने का मौका मिला था। ऐसे में हम दोनों की जान-पहचान तो थी ही। जब कन्हैयालाल वाला संकट आया तो यह श्री कान मोहन ही थे जिन्होंने श्री निर्जन तिवारी को मेरा नाम सुझाया। रायपुर में ही मुझे श्री तिवारी ने मुझे बुलाया और पहले तो मेरा स्क्रीन टेस्ट लिया। उन्होंने घूरते हुए मुझे देखा और पूछा – क्यों ‘लुडक़ी चाल’ चल सकते हो? मैनें तुरंत चल कर दिखा दिया। इसके बाद पता नहीं क्या मेरे दिमाग में आया मैनें झट से कह दिया – “अब इसके बाद और कुछ मत पूछिए आप। मुझे उससे भी ज्यादा आता है, जितना आप पूछना चाहते हैं”। इससे श्री तिवारी चुप हो गए और बोले – “ठीक है, तुम करोगे मामा की भूमिका”।

जहां तक शूटिंग की बात है तो मुंबई की टीम के रायपुर पहुंचते ही हम सब सीधे सरायपाली के लिए रवाना हो गए। फिल्म का मुहूर्त शॉट देने सरायपाली के राजा और विधायक श्री महेंद्र बहादुर सिंह ने तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पं. श्यामाचरण शुक्ल को आमंत्रित किया था। किसी कारणवश वह नहीं आ पाए तो उनकी जगह उनके छोटे भाई पं.विद्याचरण शुक्ल ने मुहूर्त शॉट दिया। वहां सुन-सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे, झन मारो गुलेल और आज अधरतिया मोर फूल बगिया जैसे गाने जफर अली फरिश्ता और गीता कौशल पर फिल्माए गए। चूंकि कान मोहन और रंजीता ठाकुर की भूमिका दुख झेलने वाली थी इसलिए उन पर गाने नहीं फिल्माए गए।

फिल्म के मुख्य कलाकारों में श्री कान मोहन सिंधी फिल्मों के उस वक्त सुपरहिट हीरो हुआ करते थे। उनकी सिंधी फिल्म ‘आबाना’ उस वक्त सुपर-डुपर हिट रही थी। बाद में श्री कानमोहन अमिताभ बच्चन और नवीन निश्चल के साथ ‘परवाना’ और श्री महेश कौल निर्देशित ‘हम कहां जा रहे हैं’ में नजर आए थे। वह राजेश खन्ना और कादरखान के साथ थियेटर में भी सक्रिय रहे। इन दिनों वह गोरेगांव सिद्धार्थ नगर में रहते हैं। नायिका रंजीता ठाकुर बाद में विद्या सिन्हा और अमोल पालेकर के साथ ‘रजनीगंधा’ में नजर आई थी। इस फिल्म में छोटे भाई की भूमिका करने वाले जफर अली फरिश्ता ने बाद में हिंदी फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं की। बाद में उन्होंने ‘भागो भूत आया’ जैसी फिल्म भी बनाई थी।

डिजिटल स्वरूप में रिलीज होगा छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘घर द्वार’
1971 से 1981 तक यह फिल्म छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, यूपी और बिहार में रिलीज होती रही। आकाशवाणी से भी इसके गीत खूब बजे। लेकिन 1987 में निर्माता विजय पांडेय की हादसे में मौत के बाद यह सारा सिलसिला खत्म हो गया। स्व.विजय कुमार पांडेय के पुत्र जयप्रकाश पांडेय ने बताया कि पिताजी की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका था और किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि घर में रखा एक मात्र प्रिंट खराब हो रहा है। इसके अलावा फिल्म का एक प्रिंट और नेगेटिव मुंबई में दादर स्थित रंजीत स्टूडियो के क्वालिटी लैब में था। लैब के मालिक बाबू भाई देसाई की मौत के बाद इसे बैंगलुरू के मनोहर शेट्टी ने खरीद लिया। इस दौर में लैब की पुरानी बिल्डिंग तोड़ कर नई बनाई गई। इस दौरान पांडेय परिवार का मुंबई में संपर्क नहीं रहा। ऐसे में फिल्म के नेगेटिव, पॉजिटिव और अन्य रश प्रिंट गुम हो गए। जयप्रकाश पांडेय के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्होंने अपने भाई जयसंतोष पांडेय (अब दिवंगत) के साथ मिलकर प्रिंट को तलाशने की काफी कोशिश की। अंततः मुंबई में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ के निर्माता-निर्देशक मनु नायक के माध्यम से लैब की जानकारी मिली। लेकिन वहां पहुंचने पर निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद उन्होंने पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में भी प्रिंट की खोजबीन की लेकिन वहां इसका कोई रिकार्ड नहीं मिला। इसी दौरान मुंबई में पिताजी के पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। जिसमें एक सज्जन के जरिए दादर में ही मराठी फिल्मों के एक निजी संग्रहालय में इस फिल्म का प्रिंट मिला। श्री पांडेय के मुताबिक संपूर्ण 13 रील का यह प्रिंट मिल तो गया लेकिन यह बहुत ही खस्ता हाल में था। दूसरी दिक्कत यह थी कि जैसे ही रायपुर में कुछ लोगों को यह मालूम हुआ तो फिल्म और विडियो के कारोबार से जुड़ा एक कारोबारी उनसे हर हाल में प्रिंट का ‘सौदा’ करने दबाव डालने लगा। लेकिन उस वक्त कुछ शुभचिंतक सामने आए और हम लोगों ने दृढ़ता से मना कर दिया।

श्री पांडेय ने बताया कि इस प्रिंट को पुनर्जीवित करने मुंबई के तकनीशियनों से मार्गदर्शन लिया गया था। जिसमें एक विचार इस पॉजिटिव से नेगेटिव बनाकर फिर से सेल्युलाइड फार्म में पॉजिटिव तैयार कराने का था। लेकिन इस दिशा में काम शुरू होते तक डिजिटल का जमाना आ गया। ऐसे में अब नई प्रक्रिया के तहत पूरे सेल्युलाइड पॉजिटिव प्रिंट के हर फ्रेम की स्कैनिंग होगी। इसकी पिक्चर और साउंड क्वालिटी सुधारी जाएगी। उसके बाद उसका एक मूल नेगेटिव प्रिंट बनाया जाएगा। जिसके बाद डिजिटल फार्म में सैटेलाइट के जरिए यह फिल्म रिलीज की जाएगी।

श्री पांडेय ने बताया कि यह संयोग ही है कि जिस क्वालिटी लैब से फिल्म का प्रिंट नष्ट हुआ था उसी के नए मालिक की लैब से इस फिल्म को पुनर्जीवन मिलेगा। श्री पांडेय के मुताबिक इन दिनों मुंबई में श्वेत श्याम फिल्मों को डिजिटाइज करने का काम काफी जोरों पर चल रहा है, इसलिए छह माह की कोशिशों के बाद उनकी फिल्म का नंबर दिसंबर के दूसरे सप्ताह में आया है। सारी प्रक्रिया में 10 से 12 दिन का वक्त लगेगा। इसके बाद वह 23 दिसंबर 2010 को स्व.श्री विजय कुमार पांडेय की जयंती के अवसर पर फिल्म को डिजिटल स्वरूप में रिलीज करने की तैयारी है।

एक अनुरोध
पांडेय परिवार की स्मृतियों पर आधारित प्रस्तुत आलेख में संभव है कहीं कुछ त्रुटि रह गई हो। इस फिल्म से जुड़ी हस्तियां और अन्य सुधिजन से अनुरोध है कि कृपया अपनी ओर से इसमें संशोधन व अन्य जानकारी एवं स्मृतियों को सभी के साथ बांटने हेतु टिप्पणी करने का कष्ट करें…

 

प्रस्तुत आलेख लिखा है श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी ने। भिलाई नगर निवासी, जाकिर जी पेशे से पत्रकार हैं। प्रथम श्रेणी से बीजेएमसी करने के पश्चात फरवरी 1997 में दैनिक भास्कर से पत्रकरिता की शुरुवात की। दैनिक जागरण, दैनिक हरिभूमि, दैनिक छत्तीसगढ़ में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं देने के बाद आजकल पुनः दैनिक भास्कर (भिलाई) में पत्रकार हैं। “रामेश्वरम राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता” का प्रथम सम्मान श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी को झांसी में दिसंबर 2004 में वरिष्ठ पत्रकार श्री अच्युतानंद मिश्र के हाथों दिया गया।

मोहम्मद जाकिर हुसैन
मोहम्मद जाकिर हुसैन
(पत्रकार)
पता : क्वार्टर नं.6 बी, स्ट्रीट-20, सेक्टर-7, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल : 9425558442
ईमेल : mzhbhilai@yahoo.co.in

 

 

गीत सुन के कईसे लागिस बताये बर झन भुलाहु संगी हो …

20 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राहुल सिंह
    दिसम्बर 08, 2010 @ 19:40:42

    जाकिर बहुत बधाई के पात्र हैं, आपसे हमेशा उम्‍मीद रहेगी.

    प्रतिक्रिया

  2. ASHOK BAJAJ
    दिसम्बर 08, 2010 @ 23:26:45

    सुग्घर हे .

    प्रतिक्रिया

  3. pragyawatar sahu
    दिसम्बर 09, 2010 @ 17:31:35

    Zakhir Bhai has also done an appreciable task. It is a very interesting article. The Chhattisgarhi art and culture is very rich and prosperous but it needs publicity in an international platform. Movies are the best way to spread the goodness of Chhattisgarhi culture. Pandey family needs appreciation for this remarkable contribution to culture of their motherland.

    Regards,

    Pragyawatar Sahu
    Journalist
    Central Chronicle
    Bhilai.
    Mobile: 9993327009.

    प्रतिक्रिया

  4. Sanjeeva Tiwari
    दिसम्बर 09, 2010 @ 21:52:37

    संगी जी, गीत के संगें संग गीत के पाछू के गोठ-बात ला बताके अड़बड़ सुघ्‍घर काम करत हावव आपमन हा.

    जाकिर भाई के मिहनत बर मोर बारंबार धन्‍यवाद, आघू अउ अगोरा हे….

    प्रतिक्रिया

  5. arun kathote
    दिसम्बर 09, 2010 @ 22:16:08

    Dear zakir,
    behad mehnat ki hai, badhai. film me mere father ns bhi part kiya hai isliye purani yade taja ho gai. film relese hui tab mai 12-13 sal ka hounga, lekin kuchh-kuchh yad ata hai. khar pitaji ka naam thik kar dena. shesh milne par.
    Again Thanks.
    Arun Kathote

    प्रतिक्रिया

  6. dilip kumar sahu
    दिसम्बर 09, 2010 @ 22:17:19

    jakir bhai ke prayas bahut sugghar havey. hamar cg ke film, geet au sangit ke atek badiya sanklan ke liye…….. bahut bahut badhai.

    प्रतिक्रिया

  7. बी एस पाबला
    दिसम्बर 09, 2010 @ 23:15:42

    ‘घर द्वार’ की बात चलते ही रफ़ी सा’ब का गाया गीत कानों में गूंजने लगता है।

    जाकिर जी द्वारा प्रस्तुत आलेख ‘घर द्वार’ के कई अनछुए पहलुओं से परिचित कराता है

    आभार

    प्रतिक्रिया

  8. Tahir Iqbal
    दिसम्बर 10, 2010 @ 15:46:08

    Zakir Sir, apka article padhkar bahut achcha laga. Chhattisgarhi cinema ke bare mein jo jankari is article se mili, wo aaj tak kabhi-kahin nahi padhi-suni thi. Yeh jankar bahut garv mehsus kar raha hu ki Chhattisgarh mein 1975 mein hi pehli film ban gayi thi. Cinema- sanskriti aur kala ka parichayak hai aur Chhattisgarh ki samriddha kala ko vishwa prasiddha karne mein aham bhumika nibha sakta hai. Aaj Chhaliwood kewal Bollywood to blindly follow kar raha hai- jo ki galat hai. But aaj bhi kuch aise log hain jo kala, parampara aur sahitya par based filme bana rahe hain.
    Pandey pariwar ne jo sarahniya kaam kiya hai uske liye ve hamesha yaad kiye jate rahenge.
    Zakir Sir badhai ke patra hai. Ummed karta hu ki future mein bhi aise gyanwardhak articles likhte rahenge.

    Apka Shishya….
    Tahir Iqbal…

    प्रतिक्रिया

  9. Chandrakant Pargir
    दिसम्बर 10, 2010 @ 18:37:11

    Dear Jakir bhai

    Appka Lekh aapki Mehnat dikha raha hai sath hi Chhattisgarh ka Film Etihas ki na keval Virasat ko bata raha hai balki aisi dharoharo ko sanjone ke liye prerit bhi kar raha hai…keep it up…

    Chandrakant

    प्रतिक्रिया

  10. Harihar Vaishnav
    दिसम्बर 10, 2010 @ 20:47:28

    Is shodhpuurna jaankaarii ke liye jahaan Husain saahab qaabile taarif hain wahin ise apne blog par prastut karane ke liye ‘anaam sangii’ kaa bhii dil kii gahraaiyon se shukraguzaar huun. aage bhii aap se aisii hii jaankaarii kii apekshaa banii rahegii.
    –Harihar Vaishnav

    प्रतिक्रिया

  11. raajendra sungaaria
    दिसम्बर 11, 2010 @ 17:39:46

    Dear जाकिर
    Exillent…….. very well.
    raajendraSungaria

    प्रतिक्रिया

  12. alison
    दिसम्बर 12, 2010 @ 21:25:41

    zakir bhai,
    gazab ki jaankari di hai aapne isss article ke madhyam se, aur yakeenan bahut mehnat ka kaam tha. aapse aagey bhi aaisey hi gyanvardhak lekh ki umeed hai.

    Congrats.
    Alison

    प्रतिक्रिया

  13. govind patel
    दिसम्बर 12, 2010 @ 21:57:42

    जाकिर भाई,

    जानकारी अच्छी एकत्रित की है। इस फिल्म के बारे में सुना काफी है, देखा नहीं। इसकी डिजिटल स्वरुप देखने की इच्छा है। 23 दिसंबर को इंतजार रहेगा। इसकी तो स्टोरी भी अच्छी बनेगी, पठनीय भी रहेगी। स्टोरी बनाए।

    धन्यवाद

    गोविंद पटेल
    पत्रकार रायपुर

    प्रतिक्रिया

  14. Ajay Lal
    दिसम्बर 13, 2010 @ 20:32:08

    Dear Jaker Bhai
    Good Song

    प्रतिक्रिया

  15. Prasanna Sharma
    अप्रैल 28, 2011 @ 20:18:04

    junna gana sune le au wohu Raf ke gala ke awaj , chhatisgarhi bole , ka batawaw sangi,…….tum man la jatka johaau kamti he Jai Johar……

    प्रतिक्रिया

  16. pallavi shilpi
    दिसम्बर 26, 2011 @ 12:13:17

    thanks to my mom she told me about “GHAR DWAR”.

    supap song……….

    प्रतिक्रिया

  17. Neelu Megh
    अप्रैल 04, 2012 @ 00:11:11

    zakir bhai prayas aur aalekh ke liye hardik badhai . “ghar dwar” mere liye voh paydaan hai jahan se maine apni filmi yatra shuru ki thi aur ek mahtwapurna kirdar janab Ballu Rizwi (Iqbal Ahmed Rizwi ke aposit nibhaya tha lekin shayad miss print ya printing mistake ki vajah se mera naam artist ki list se chhoot gaya hai aap ise tasdeek karen aur corect karen .. thanks Neelu Megh (Neela Meghani)

    प्रतिक्रिया

  18. dilip gupta patrkar saraipali...9926126696
    अगस्त 14, 2013 @ 19:08:15

    kripaya is movie ki CD jari kare….taki log achche chhatisgarhi gano se vanchit na ho paye….

    प्रतिक्रिया

  19. कीर्तन राम साहू ग्राम व पोस्ट मदनपुर
    नवम्बर 11, 2013 @ 20:48:20

    छत्तीगढी गानों की लगभग संपूर्ण सूची को इंटरनेट में डालने का प्रयास बहुत ही सराहनीय है, पुरानी छत्तीसगढी गानों में जो मिठास है, वह वास्तव में आने वाली लंबी पीढी तक याद किये जायेंगे, गुनगुनाये जायेंगे, वैसे तो आजकल फुडहल गाने प्रचलन में आने लगी है जोकि थोडे ही दिनों तक टिकती है, लेकिन दिल को छू लेने वाली वह संगीत तो पुराने गाने में ही है गायक परिवार के समस्त कलाकार, संगीतकार, गीतकार को मेरी ओर से सादर नमन, सादर प्रणाम

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

हमारी यह पेशकश आपको पसंद आई ?
अपना ईमेल आईडी डालकर इस ब्लॉग की
सदस्यता लें और हमारी हर संगीतमय भेंट
को अपने ईमेल में प्राप्त करें.

Join 610 other followers

हमसे जुड़ें ...
Twitter Google+ Youtube


.

क्रियेटिव कॉमन्स लाइसेंस


सर्वाधिकार सुरक्षित। इस ब्लॉग में प्रकाशित कृतियों का कॉपीराईट लोकगीत-गाथा/लेख से जुड़े गीतकार, संगीतकार, गायक-गायिका आदि उससे जुड़े सभी कलाकारों / लेखकों / अनुवादकों / छायाकारों का है। इस संकलन का कॉपीराईट छत्तीसगढी गीत संगी का है। जिसका अव्यावसायिक उपयोग करना हो तो कलाकारों/लेखकों/अनुवादकों के नाम के साथ ब्लॉग की लिंक का उल्लेख करना अनिवार्य है। इस ब्लॉग से जो भी सामग्री/लेख/गीत-गाथा/संगीत लिया जाये वह अपने मूल स्वरूप में ही रहना चाहिये, उनसे किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ अथवा फ़ेरबदल नहीं किया जा सकेगा। बगैर अनुमति किसी भी सामग्री के व्यावसायिक उपयोग किये जाने पर कानूनी कार्रवाई एवं सार्वजनिक निंदा की जायेगी...

%d bloggers like this: