भरथरी (प्रसंग 1. राजा का जोगी वेष में आना) … Bharthari

लोक-साहित्य की अपनी मिठास कुछ अलग ही है। लोक-साहित्य में रचा बसा साहित्य आज भी अपनी उपस्थिति से हृदय को झंकृत कर देता है। लोक-साहित्य का प्रमुख आधार लोक जीवन है। क्योंकि सामूहिकता, रागात्मकता, लयात्मकता एवं रसात्मकता लोकजीवन के वे अंग हैं जिनकी नीव पर समूची लोक संस्कृति टिकी हुई है। विद्वानों का भी मत है की लोक संस्कृति की अवधारणा लोक जीवन की सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर निर्मित और विकसित होती है।

ऐसी मान्यता है कि लोक-साहित्य, लोक कण्ठ पर पुष्पित, पल्लवित होता है और विभिन्न आयामों को स्पर्श करते हुए लोक के मध्य जीवन्त रहता है। कहना गलत न होगा कि लोक-साहित्य बहती नदी के समान है जिसकी धारा अपने बहाव में बहुत कुछ छोड़ देती है और नये तत्वों को आत्मसात भी कर लेती है।

बाजारीकरण के वर्तमान दौर में सर्वाधिक क्षति हमारे लोक-साहित्य कि हुई है। पाश्चात्य संस्कृति के चलते हमारी लोक संस्कृति को आधुनिकता का चोला पहनाया जा रहा है। परिणामस्वरूप हम जमाने कि दौड़ में शामिल तो हो रहे हैं लेकिन मौलिक पहचान प्रभावित हो रही है। स्थिति यह है कि आपाधापी के इस दौर में लोक-साहित्य के अनेक समृद्ध अध्याय उपेक्षित होने के कारण विलोपन के कगार पर चले गए हैं और नई पीढ़ी के संज्ञान में ही नहीं है। ऐसे अध्यायों का अद्यतन स्वरूप शोध कर सुरक्षित और प्रकाशित करना हमारा ध्येय है।

लोक-साहित्य के विभिन्न घटक आज भी छत्तीसगढ़ कि माटी में रचे-बसे हैं, लेकिन सुविधाभोगी प्रगति कि दौड़ में उनकी स्थिति बहुमंजिली इमारतों के समक्ष झोपड़ी जैसी हो गई है। चाहे लोकगीत, लोकोक्ति, लोकसुभाषित या लोकनाट्य हो अथवा लोकगाथाएं, सबकी दशा एक जैसी है।

लोकगाथाओं में सम्पूर्ण लोक, समाज, रीतिरिवाज, सम्बन्ध, संस्कार, त्यौहार, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सबका चित्रण रहता है। लोक संस्कृति को लोकगाथाएँ पोषित करती हैं। लोक मानव सीधा-साधा, सहज विश्वास करने वाला होता है। लोकगाथाओं के माध्यम से जो समाज हमारे समक्ष आता है उसमें सभी पक्षों को स्पष्टतः देखा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ की आत्मा फुट पड़ती है, यहाँ गूंजने वाले लोक-गीतों में, तीज-त्योहारों में तथा कही जाने वाली लोक-कथाओं में। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को, उसकी आंचलिक संस्कृति को यदि एक साथ देखना चाहें तो यहाँ प्रचलित लोकगाथाओं में देखा जा सकता है, जिसमें छत्तीसगढ़ के लोकविश्वास, लोकधर्म, आचार-संस्कार आदि सहजतः प्राप्त होते हैं।

वैसे तो छत्तीसगढ़ में प्रचलित अधिकांश लोकगाथाएँ अन्य अंचलों में भी किसी-न-किसी रूप में प्रचलित हैं, किंतु छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी संस्कृति अपेक्षाकृत अधिक मुखर है। यहाँ अन्य क्षेत्रों की लोकसम्पदा को इतने आदर से ग्रहण किया है की वह उसकी निजी निधि बन गयी है। तात्पर्य यह कि विभिन्न अंचलों में प्रचलित लोकगाथाएँ छत्तीसगढ़ में आकर उसकी अपनी हो गयी है। वस्तुतः लोकसाहित्य किसी क्षेत्र विशेष की सम्पत्ति न होकर सर्वमान्य का होता है।

छत्तीसगढ़ में वैसे तो कई लोकगाथाएँ प्रचलित हैं, लेकिन आज हम बात करेंगे भरथरी की। आंचलिक परम्परा में आध्यात्मिक लोकनायक के रुप में प्रतिष्ठित राजा भर्तृहरि के जीवन वृत्त, नीति और उपदेशों की लोक शैली में प्रस्तुति है – भरथरी। भरथरी मालवा, बुंदेलखण्ड की पृष्ठभूमि पर आधारित एक ऐतिहासिक लोक कथा है, जिसे पूरे उत्तरभारत में अलग-अलग तरीके से गाया जाता है। इस गाथा को गोरखपंथी साधु सारंगी अथवा चिकारे पर गाते हैं। इन्हें जोगी भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय के गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ के सिद्धांतों से सम्प्रेरित इस गाथा में रानी सामदेवी और राजभोग को त्यागकर राजा भर्तृ के वैराग्य धारण की घटनाएँ वर्णित हुई हैं।

यह लोकगाथा दो भागों में विभाजित है। प्रथम भाग में राजा भरथरी का वैराग्य तथा रानी सामदेवी तथा पिंगला द्वारा पूर्वजन्म की कथा है। दूसरे भाग में राजा भरथरी का वन में जाकर काले मृग का वध करना एवं माता मैनावती के आदेशानुसार वैरागी होने की कथा है। योग-भोग का अन्तर्द्वन्द और करुण विप्रलम्भ का परिपाक इस गाथा में चरमोत्कर्ष पर दिखायी देता है।

संक्षिप्त कथा इसप्रकार है –

नवविवाहित राजा भरथरी जब रानी सामदेवी से उत्तरी छुड़ाकर चलते हैं तो सामदेवी जाने का कारण पूछती है। राजा जन्मकुंडली में वैराग्य का योग बताते हैं, किंतु सामदेवी संतुष्ट नहीं होती। राजा सुहागरात के दिन पलंग की पाटी टूट जाने का कारण पूछते हैं। रानी असमर्थता व्यक्त करते हुए बताती है कि मेरी छोटी बहिन पिंगला सब जानती है। राजा पिंगला को पत्र भेजते हैं। पत्र पाकर पिंगला दिल्ली से आकर राजा भरथरी को बताती है कि पूर्व जन्म में रानी सामदेवी उनकी माँ थीं। अब चाहें आप योग करो या भोग करो। राजा उदास हो जाते हैं।

उदास राजा, रानी सामदेवी से आज्ञा लेकर सिंहलद्वीप के वन में, काले मृग का शिकार करने के लिए जाते हैं। राजा का खेमा देखकर, हिरणियाँ भेद जानकर, अपने पति के प्राणों कि याचना करके स्वयं के प्राण लेने का आग्रह करती हैं। राजा भरथरी स्त्रियों पर हाथ उठाना पौरुष के विपरीत मानते हैं।

भरथरी के पास से निराश होकर, हिरणियाँ काले हिरण से वन छोड़ने की प्रार्थना करती हैं। काला हिरण राजा भरथरी से कोई बैर न होने के कारण आश्वस्त रहता है। राजा भरथरी काले मृग का वध करने के लिए सात तीर चलाते हैं। छः तीर क्रमशः गंगा, वनस्पति देवी, गुरु गोरखनाथ एवं मृग के सींग के कारण बेकार हो जाते हैं। सातवें तीर से हिरण घायल होता है। मरते समय हिरण राजा को श्राप देता है – “हे राजा! मुझे तो आपने मार दिया, अब मेरी आँख अपने रानी को श्रृंगार के लिए दे देना, मेरे सींग किसी राजा के दरवाजे पर मढ़ देना, मेरी खाल का साधु के लिए आसन बना देना, और मेरा मांस तुम तल कर खा लेना, किंतु एक बात याद रखना जिस तरह मेरी सत्तर सौ रानियाँ कलप रहीं हैं वैसे तुम्हारी रानियाँ भी कलपेंगी।”

राजा व्यथित होकर गुरु गोरखनाथ के पास पहुँचकर, काले मृग को जीवित करने के लिए कहते हैं। गुरु गोरखनाथ के असमर्थता दिखलाने पर राजा आत्महत्या की धमकी देते हैं। विवशतः गुरु गोरखनाथ काले मृग को जीवित कर देते हैं। काला मृग अपना श्राप वापस लेकर अपनी हिरणियों के पास चला है।

इधर राजा भरथरी के मन में वैराग्य जागता है और वे गुरु गोरखनाथ से दीक्षा की प्रार्थना करते हैं। गोरखनाथ उनकी राजसिक वृत्ति को देखकर दीक्षा देने से इंकार कर देते हैं। अंत में इस बात पर तैयार होते हैं की राजा रानी से माँ कहकर भिक्षा माँगेगे।

राजा जोगी वेष धारण करके, हाथ में सारंगी लेकर महल के द्वार पर अलख जगाते हैं। रानी सामदेवी राजा को जोगी वेष में देखकर परेशान हो जाती है। वह राजा के इंकार करने पर उससे कहते हैं कि तुम माता के घर चली जाओ। राजा का हठ देखकर, राज्य में रहकर ही तपस्या करने के लिए कहती हैं। राजा रानी से गँगा वहीं ले आने कि माँग करते हैं। रानी अपने सत् से गँगा को वहाँ ले आती है। तब राजा तीर्थस्थलों की उपेक्षा की दुहाई देते हैं। रानी गँगा को वापस भेज देती है। अंततः गुरु गोरखनाथ रानी को समझाकर, राजा भरथरी को साथ लेकर वन में तपस्या के लिए चले जाते हैं।

 

छत्तीसगढ़ में भरथरी गायन की पुरानी परंपरा को सुरुजबाई खांडे ने रोचक लोकशैली में प्रस्तुत कर विशेष पहचान बनाई है।

मांढ़र निवासी रेखादेवी जलक्षत्री छत्तीसगढ़ की जानी-मानी लोकगायिका हैं। पांच वर्ष की उम्र से अपने दादा स्व.मेहतर प्रसाद बैद को भरथरी गीत गाते सुनकर उन्हीं की तरह बनने की इच्छा रखने वाली रेखादेवी बताती हैं कि दस वर्ष की उम्र से लोकगीत गा रही हूं। रेखादेवी जलक्षत्री ‘महाकालेश्वर भरथरी पार्टी’ के माध्यम से आठ सदस्यीय टोली के साथ छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में विभिन्न अवसरों पर कार्यक्रम देने जाती हैं। राजा भरथरी के लोकगाथा को हावभाव के साथ पेश करना आसान बात नहीं है। तभी तो केवल गिने-चुने कलाकार ही भरथरी गायन में सफल होते हैं। रेखादेवी जलक्षत्री का मानना है कि पारम्परिक लोकगीतों से माटी की महक आती है। ग्रामीण जनजीवन में रचे-बसे लोकगीत किसी परिचय के मोहताज नहीं। यही वजह है कि वो जब कार्यक्रम देने जाती हैं तो राजा भरथरी के जीवन से जुड़े विविध प्रसंगों को प्रस्तुत करती हैं। जन्म, विवाह, राजा भरथरी के बैराग, वियोग प्रसंग, भिक्षा प्रसंग जो नौ खंड में है। रोचक प्रसंगों को लोग घंटों सुनना पसंद करते हैं। इनकी इच्छा छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जीवंत बनाये रखने की है, रेखादेवी जलक्षत्री कहती हैं “जब तक सांस हे तब तक राजा भरथरी के लोकगाथा सुनाय बर कमी नई करंव।”

रेखादेवी जलक्षत्री
रेखादेवी जलक्षत्री

(प्रस्तुत आलेख में डॉ.अशोक ‘अज्ञानी’, प्रो.सूर्यप्रसाद दीक्षित तथा देशबन्धु अखबार के शब्दों को पिरोया गया है, आप सबका आभार… धन्यवाद)

 

आज से हम रेखादेवी जलक्षत्री के द्वारा प्रस्तुत भरथरी के कुछ प्रसंगों को आपके लिए श्रृंखला के रूप में लायेंगे जिसे ‘टी सीरीज’ म्यूजिक कंपनी द्वारा सन् 1993 में रिलीज किया गया था।

1. राजा का जोगी वेष में आना
2. चम्पा दासी का जोगी को भिक्षा देना
3. चम्पा दासी द्वारा राजा को पहचानना
4. रानी का चम्पा दासी को सजा देना
5. रानी से चम्पा दासी के लिए विनती
6. शंकर पूजा, चम्पा को शंकर दर्शन

भरथरी - रेखादेवी जलक्षत्री

 

आइए सुने भरथरी लोकगाथा का प्रसंग “राजा का जोगी वेष में आना”

— गीत —
घोड़ा रोवय घोड़ेसार मा, घोड़ेसार मा या, हाथी रोवय हाथीसार मा
घोड़ा रोवय घोड़ेसार मा, घोड़ेसार मा वो, हाथी रोवय हाथीसार मा
मोर रानी ये वो, महलों में रोवय
मोर रानी ये या, महलों में रोवय
येदे धरती में दिए लोटाए वो, ऐ लोटाए वो, भाई येदे जी
येदे धरती में दिए लोटाए वो, ऐ लोटाए वो, भाई येदे जी

सुन लेबे नारी ये बाते ला, मोर बाते ला या, का तो जवानी ये दिए हे
सुन लेबे नारी ये बाते ला, मोर बाते ला वो, का तो जवानी ये दिए हे
भगवाने ह वो, मोर कर्म में ना
भगवाने ह या, मोर कर्म में ना
येतो काये जोनी मोला दिए हे, येदे दिए हे, भाई येदे जी
येदे काये जोनी दिए हे, येदे दिए हे, भाई येदे जी

— गाथा —
ऐ रानी सामदेवी रइथे ते रागी (हौव)
राजा भरथरी के वियोग में (हा)
मुड पटक पटक के रोवत रिथे (रोवत थे)
अउ कलपत रिथे (हौव)
किथे हे भगवान (हा)
मोर किस्मत फूट गे (फूट गे)
अतका बात ला सुन के पारा परोस के मन आथे (हौव)
आथे त रानी सामदेवी ल पूछथे (हा)
रानी (हौव)
तोला का होगे (हौव)
ते काबर रोवत हस (हा)
तब रानी सामदेवी रहाय ते बतावत हे (का बतावत हे)

— गीत —
बोली बचन मोर रानी हा, मोर रानी हा वो, सुन बहिनी मोर बाते ल
बोली बचन मोर रानी हा, मोर रानी हा या, सुन बहिनी मोर बाते ल
मोर माँगे के या, येदे सेन्दुर नईये
मोर माथे के वो, येदे टिकली नईये
में ह जन्मों के होगेंव रांडे वो, भाई येदे जी
में ह जन्मों के होगेंव रांडे वो, भाई येदे जी

भाई रोवे गुजराते हा, गुजराते हा वो, बुलबुल रोवे रानी पिंगला के
भाई रोवे गुजराते हा, गुजराते हा या, बुलबुल रोवे रानी पिंगला के
बारा कोस के वो, फुलवारी रोवय
बारा कोस के ना, फुलवारी रोवय
उहू जुलुम होगे सुखाये वो, भाई येदे जी
उहू जुलुम होगे सुखाये वो, भाई येदे जी

— गाथा —
दोनों हाथ ला जोड़ के रानी सामदेवी किथे रागी (हौव)
बहिनी हो (हा)
मोर मांग के सेन्दुर मिटागे (हौव)
मोर माथ के टिकली मिटागे (मिटागे)
में जन्मों के रांड होगेंव (रांड होगेंव)
सब झन पूछथे, ये बात कइसे होइस रानी (हौव)
तब बताथे (हा)
जे दिन मोर राजा इहां ले गिस (हौव)
तो कहिस हावय (हा)
जब तक के में जिन्दा रहूँ (हौव)
तब तक ये तुलसी के बिरवा हराभरा रही (हा)
अउ जब तक ये तुलसी के बिरवा हराभरा रही, समझ जबे में जिन्दा रहूँ (जिन्दा रहूँ)
अउ तुलसी के बिरवा सुखा जही (हौव)
त में मर जहूं (मर जहूं)
यही तुलसी के बिरवा ला मोला निशानी देके गिस हे बहिनी हो (हौव)
आज ये तुलसी के बिरवा सुखा गे (हा)
मोर करम फुट गे (हौव)
आज इही मेर के बात इही मेर के रइगे रागी (हा)
राजा भरथरी राहय तेन बिनती करत अपन घर ला आवत हे (हा)

— गीत —
बिनती करे राजा भरथरी
राजा भरथरी या, आवत थे अपन घरे ला
येदे घरे में वो, पहुँचत हबाय ये द्वार में
येदे द्वार में या, लिली घोड़ी ला देखत हाबे ना, भाई येदे जी
राजा बोलथे वो, करले अमर राजा भरथरी
येदे काहथे वो, करले अमर राजा भरथरी
बाजे तबला निशान, करले अमर राजा भरथरी, भाई येदे जी

मन में सोंचे लिली घोड़ी हा
लिली घोड़ी हा वो, राजा भरथरी ला देखी के
में ह आये हव गा, राजा ऐ इंदर पठाये हे
मोला कोने बेटा देही ए गांवे काहथे, भाई येदे जी
राजा बोलथे वो, करले अमर राजा भरथरी
येदे काहथे वो, करले अमर राजा भरथरी
बाजे तबला निशान, करले अमर राजा भरथरी, भाई येदे जी

गुस्सा होवय लिली घोड़ी हा
लिली घोड़ी हा वो, राजा भरथरी ला देखी के
वो दे काहत ना, का ये बतावव ये तोला ना
अइसे बोलत हे वो, लिली ये घोड़ी हा आगे ना, भाई येदे जी
राजा बोलथे वो, करले अमर राजा भरथरी
येदे काहथे वो, करले अमर राजा भरथरी
बाजे तबला निशान, करले अमर राजा भरथरी, भाई येदे जी

— गाथा —
अब ये राजा भरथरी राहय ते, अपन दरवाजा में पहुँचथे रागी (हौव)
जब दरवाजा में पहुँचथे, तब एक लिली घोड़ी नाम के (हा)
वो घोड़ी वो दरवाजा में बइठे रिहिस (बइठे राहत हे)
वो इंदर भगवान के (हौव)
भेजे हुवे लिली घोड़ी रिथे (हा)
गुस्सा हो के लिली घोड़ी किथे राजा (हौव)
तें तो योगी होगेस (हा)
ना तोला घोड़ा चाहिए (हौव)
ना तोला हाथी चाहिए (हा)
अब तें तो योगी होगेस (हौव)
अउ इंदर भगवान भेजे हे तोर खातिर (हा)
मोला लगाम कोन दिही (हौव)
अइसे कइके राजा भरथरी के सामने में (हा)
लिली घोड़ी रहाय तेन प्राण त्याग देथे (प्राण त्याग देथे)

— गीत —
आगे चले राजा भरथरी, राजा भरथरी या, देखथ रइये किसाने ला
आगे चले राजा भरथरी, राजा भरथरी वो, देखथ रइये किसाने ला
कोनों चिन्हे नहीं, येदे योगी ला या
कोनों चिन्हे नहीं, येदे योगी ला वो
वो ह डेहरी में धुनी जमाये हे, ये जमाये हे, भाई येदे जी
वो ह डेहरी में धुनी जमाये हे, ये जमाये हे, भाई येदे जी


गायन शैली : भरथरी
गीतकार : ?
रचना के वर्ष : 1993
संगीतकार : रामकुमार साहू
गायन : रेखा जलक्षत्री
एल्बम : भरथरी
संस्‍था/लोककला मंच : महाकालेश्वर भरथरी पार्टी
म्यूजिक कंपनी : टी सीरीज

 

यहाँ से आप MP3 डाउनलोड कर सकते हैं

 

गीत सुन के कईसे लागिस बताये बर झन भुलाहु संगी हो …

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15 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राहुल सिंह
    जन 01, 2011 @ 05:45:17

    यह उद्यम चार चांद लगाने वाला है.

    प्रतिक्रिया

  2. Sarju Patel
    मार्च 15, 2011 @ 07:00:44

    Nice to hear this Lok Geet. I remember my schooling days in Bilaspur CG.
    Appreciate Great efforts. Very Nice Tone.

    प्रतिक्रिया

  3. maahie nayak
    अप्रै 15, 2011 @ 11:21:53

    1 – dum jhakkas..!

    प्रतिक्रिया

  4. arun kumar sahu
    अप्रै 20, 2011 @ 02:50:07

    bahut badiya mor kana kuchhu sabd nai kehe bar

    प्रतिक्रिया

  5. SATANAND SAHU
    मई 05, 2011 @ 17:11:15

    this is the best of chhattishgarhi bhasha and the letest to letast of boli of

    प्रतिक्रिया

  6. mohinish sahu
    जुला 08, 2011 @ 21:00:40

    jen jinis la ha man haan baad din le khojat rehe haan o ha mil ge havve bad kushi hoe havve ga…..

    प्रतिक्रिया

  7. pravesh kumar
    फ़र 19, 2012 @ 20:04:48

    madhur chhattisgarhi Lokgeet

    प्रतिक्रिया

  8. dayanand sahu (chaparid wale)
    मई 11, 2012 @ 15:11:50

    dil ko chhune wala, manmohak gano ka rela he.

    प्रतिक्रिया

  9. chandrahas
    दिस 26, 2012 @ 16:41:44

    ye haa to mor nanpan k favrate hare

    प्रतिक्रिया

    • sunil kumar sahu
      मार्च 19, 2015 @ 17:22:20

      आप मन के करे गे परयास ह छतीसगढी भाषा,संसकिरती, कला ला नवा पीढी मन ला घलो अपन परदेस के बारे म जाने म उपयोगो हावय।। ।।जय जोहार।।

      प्रतिक्रिया

  10. yash patel
    मई 21, 2013 @ 17:14:15

    bahut bariya lagis haway sangi re

    प्रतिक्रिया

  11. Poonmaram guriya
    जुला 18, 2013 @ 17:10:15

    ध्नय

    प्रतिक्रिया

  12. laxmi parjapat poonmaram guriya
    जुला 27, 2013 @ 19:49:44

    good

    प्रतिक्रिया

  13. Santoshmaravi jila balaghat tahsil lanji gram sanduka
    सित 03, 2014 @ 07:00:17

    Bharthari geet ko download nahi Kar pa raha hu.ap mere help kigiye.

    प्रतिक्रिया

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