बिहनिया के उगत सुरूज देवता … Bihaniya Ke Ugat Suruj Devta

पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस के निर्माता-निर्देशक श्री मनु नायक जी से आप तक पहुँचाने के लिए फिल्म के गानों का ऑडियो और फोटोग्राफ प्राप्त हुआ है।

आज लाए है आपके लिए ‘कहि देबे संदेस’ फिल्म का दूसरा गीत…

कहि देबे संदेस

 

छत्तीसगढ़ी आत्मा की आवाज डॉ.एस.हनुमंत नायडू ‘राजदीप’

डॉ.एस.हनुमंत नायडू मूलतः तेलुगू भाषी होने के बावजूद हिंदी और छत्तीसगढ़ी के प्रति दीवानगी की हद तक समर्पित थे। कॉलेज में वह हिंदी के प्रोफेसर थे तो पीएचडी उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों पर की। तकिया पारा दुर्ग में रहने वाले डॉ.नायडू ने शुरूआती कुछ साल दुर्ग में अध्यापन के बाद अपना कर्मक्षेत्र महाराष्ट्र को चुना। मुंबई के कॉलेज में नौकरी मिलने के पहले से ही वह युवा फिल्मकार मनु नायक के संपर्क में आ गए थे। इस युवा जोड़ी ने ‘कहि देबे संदेस’ में जो रचा वह अपने आप में एक अनूठा इतिहास बन चुका है। डॉ.नायडू के बारे में ज्यादातर जानकारी उनके बोरसी (दुर्ग) में निवासरत छोटे भाई एस.वेंकट राव नायडू जी से मिली और कुछ जानकारी मनु नायक जी ने भी दी। डॉ.नायडू का अकादमिक बायोडाटा एस.वेंकट नायडू के माध्यम से उनके नागपुर में निवासरत पुत्र के जरिए मिला।

छत्तीसगढ़ी संस्कार उन्हें घुट्टी में मिले थे – वेंकट
स्व.नायडू के छोटे भाई एस.वेंकट राव नायडू ने बताया कि दुर्ग में रहने की वजह से उनके परिवार में तेलुगू कम और छत्तीसगढ़ी ज्यादा बोली जाती थी। पिता एस.एस.नायडू बालाघाट में सिंचाई विभाग में पदस्थ थे। यहां से उनका तबादला दुर्ग में हुआ, जहां डॉ.एस.हनुमंत नायडू का जन्म 7 अप्रैल 1933 को हुआ। मारवाड़ी स्कूल में पढ़ाई के बाद उन्होंने शासकीय बहुद्देशीय उच्चतर माध्यमिक शाला और महात्मा गांधी स्कूल में शिक्षक का दायित्व निभाया। अपने बेहतरीन अकादमिक रिकार्ड की वजह से 1958 में उन्हें मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता के तौर पर जॉब मिल गई। यहां से वह कोल्हापुर गए और उसके बाद नागपुर के कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए। 25 फरवरी 1998 को नागपुर में ह्रदयघात से उनका निधन हुआ। उनके परिवार में पत्नी श्रीमती कुसुम नायडू के अलावा तीन पुत्र एस.रजत नायडू, एस.अमित नायडू और एस.सुचित नायडू हैं।

अध्यापन, साहित्य और पत्रकारिता में सक्रियता
डॉ.नायडू ने 34 साल तक हिंदी के प्रोफेसर के रूप में मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज, नागपुर के वसंतराव नाइक कला व समाज विज्ञान संस्था (पूर्व में नागपुर महाविद्यालय) और कोल्हापुर के राजाराम कॉलेज में अपनी सेवाएं दी थी। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय व नागपुर विश्वविद्यालय में एमए हिंदी का भी अध्यापन कार्य किया। नागपुर विश्वविद्यालय में शोध निदेशक के तौर पर उनके मार्गदर्शन में कई विद्यार्थियों ने पीएचडी प्राप्त की। वे मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी अभ्यास मंडल तथा कला संकाय के सदस्य रहे तथा नागपुर विश्वविद्यालय के हिंदी अभ्यास मंडल के अध्यक्ष व कला संकाय और एकेडमिक कौंसिल के पूर्व सदस्य रहे। इसके अलावा डॉ.नायडू महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल की हिंदी समिति के अध्यक्ष तथा हिंदी बालभारती पाठ्यपुस्तकों के सम्पादन मंडल के अध्यक्ष रहे। वे महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा की परीक्षा व पाठ्यक्रम समिति के सदस्य भी रहे। वे जीवन पर्यंत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। नवभारत टाइम्स मुंबई में ‘साहित्य समीक्षा’ और ‘नागपुर की सांस्कृतिक पाती’ तथा नवभारत नागपुर में ‘व्यंग्य सप्ताह’ उनके कुछ चर्चित व लोकप्रिय स्तंभ थे। महाविद्यालयीन सेवानिवृत्ति के उपरांत वे लोकमत समाचार नागपुर संस्करण में मानद संपादकीय समन्वयक के तौर पर सेवा दे रहे थे।

ऐसे पहुंचे डॉ.नायडू मुंबई
महाराष्ट्र जाने से पहले और महाराष्ट्र में मृत्युपर्यंत रहते हुए भी डॉ.नायडू छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के प्रति समर्पित रहे। डॉ.नायडू के मुंबई पहुंचने और कॉलेज ज्वाइन करने के संबंध में फिल्मकार मनु नायक बताते हैं – “दुर्ग में नायडू साहब स्कूल में पढ़ा रहे थे और साहित्यिक अभिरूचि की वजह से काव्य गोष्ठियों व साहित्यिक सम्मेलनों की एक प्रमुख पहचान बन कर उभरे थे। 1958 में वह किसी माध्यम से वह मेरे पास मुंबई आए। यहां एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रोफेसर के पद के लिए उनका इंटरव्यू था। वह बेहद घबराए हुए थे। मैनें अखबारों में छपी उनकी रचनाएं और उनका अकादमिक रिकार्ड देखने के बाद पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि – “अगर फेयर सलेक्शन हुआ तो यह नौकरी आपको ही मिलेगी। और हुआ भी यही। नौकरी मिलते ही सबसे पहले मेरे पास आए और धन्यवाद दिया। इसके बाद हम लोगों की दोस्ती परवान चढ़ती गई। वहां कॉलेज में पढ़ाते हुए नायडू साहब अक्सर मेरे पास आते थे छत्तीसगढ़ी गीतों पर अपने शोध के दौरान मार्गदर्शन लेने। छत्तीसगढ़ी के लिए उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि वह छत्तीसगढ़ की हर लोक कथा, कहावत और मुहावरों पर पूरी गंभीरता से जानकारी लेते और उसे नोट भी करते जाते। छत्तीसगढ़ी के ढेर सारे लोकगीतों को उन्होंने सहेज कर रखा था। मेरी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ की पृष्ठभूमि भी नायडू साहब के साथ बैठकों में ही बनीं और जब सारे लोग मुझे हतोत्साहित कर रहे थे तब हौसला देने वाले एकमात्र नायडू साहब ही थे। यह तो तय ही था कि मेरी फिल्म के गीत नायडू साहब ही लिखेंगे, क्योंकि मैनें उनका काम देखा था। कोई भी सिचुएशन बता दो वह तुरंत गीत लिख देते थे। नायडू साहब ने मेरी ‘कहि देबे संदेस’ और ‘पठौनी’ में ‘राजदीप’ उपनाम से गीत लिखे। गीतों की रिकार्डिंग के दौर का एक वाकया याद आ रहा है मुझे। मैनें रफी साहब को बताया था कि मेरी फिल्म में आपको छत्तीसगढ़ी के गीत गाने हैं। शायद यहां थोड़ी सी चूक हो गई और रफी साहब छत्तीसगढ़ी मतलब गीतकार का नाम समझने लगे। फिर पहले गीत की रिकार्डिंग के दौरान वह नायडू साहब को ‘मिस्टर छत्तीसगढ़ी’ कह कर पुकारने लगे। इसके बाद मैनें रफी साहब को बताया कि छत्तीसगढ़ी एक बोली है। रफी साहब ने भी अपनी गलती सुधार ली और दूसरे गीत ‘तोर पैरी के…’ की रिकार्डिंग के दौरान उन्होंने नायडू जी का ही संबोधन दिया।”

स्वाभिमान ने नहीं जमने दिया हिंदी फिल्मों में
आला दर्जे के गीतकार होते हुए भी डॉ.नायडू को हिंदी फिल्मों में जगह नहीं मिल पाई। उस दौर में भी वहां गलाकाट प्रतिस्पर्धा थी और ऐसी प्रतिस्पर्धा में डॉ.नायडू जैसी स्वाभिमानी शख्सियत का टिकना नामुमकिन था। मनु नायक एक वाकया बताते हैं कि – “तब ताराचंद बडज़ात्या अपनी राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले ‘आरती’ फिल्म शुरू कर रहे थे। चूंकि राजश्री के दफ्तर में मेरा आना जाना था तो कुछ एक बार नायडू साहब को भी मैं ले गया था। ताराचंद बडज़ात्या उनसे काफी प्रभावित थे। एक मौका ऐसा आया कि फिल्म के पहले गाने की धुन संगीतकार रोशन तैयार कर चुके थे और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी अनुबंध के बावजूद दूसरी फिल्मों में ज्यादा व्यस्त हो गए थे। अनुशासन के पाबंद ताराचंद बडज़ात्या को यह नागवार गुजरा। एक मौका ऐसा भी आया कि मैं और नायडू साहब राजश्री स्टूडियो में बैठे थे। ताराचंद बडज़ात्या ने नायडू साहब को अपने आफिस में बुलवाया और तत्काल संगीतकार रोशन की धुन पर गीत लिखने को कहा। नायडू साहब तो इस मामले में माहिर थे ही उन्होंने भी झट से वह गीत लिख भी दिया। लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी के भी कुछ हमदर्द लोग वहां थे, इन्होंने तत्काल टेलीफोन कर दिया और थोड़ी ही देर बाद वापस मजरूह का फोन ताराचंद बडज़ात्या को आ गया कि वह तुरंत स्टूडियो पहुंच कर अपना गीत दे रहे हैं। अनुबंध से बंधे होने की वजह से मजरूह साहब का गीत लेना राजश्री वालों की मजबूरी थी लेकिन इस प्रकरण से नायडू साहब अपने आप को बेहद अपमानित महसूस कर रहे थे। ऐसे में इसके बाद स्वाभिमानी नायडू साहब ने किसी भी फिल्म के लिए गीत लिखने से मना कर दिया।”

प्रमुख रचनाएं – सैकड़ों कविताएं, गजल, व्यंग्य लेख तथा शोध निबंध देश भर की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
गज़ल संग्रह – जलता हुआ सफर (हिंदी), मेरी गज़ल मशाल है
बाल साहित्य – नीला अंबर साथी मेरा (बाल काव्य संग्रह), बंबई की कहानी (बच्चों के लिए गद्य)
व्यंग्य संग्रह – तक धिना धिन
शोध – छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का लोकतात्विक तथा मनोवैज्ञानिक अनुशीलन, छत्तीसगढ़ी लोकगीत

 

स्व.नायडू के परिवार से निम्न पते पर संपर्क किया जा सकता है –
श्रीमती कुसुम नायडू
पता : ‘मनोरम’ 108, न्यू जागृति कालोनी, काटोल रोड, नागपुर
दूरभाष : 0712-2572493

श्री एस.वेंकट राव नायडू
पता : बी-3, स्ट्रीट-15, सेक्टर-ए, पंचशील हाउसिंग सोसायटी, साईं मंगलम के समीप, बोरसी, जिला-दुर्ग
मोबाइल : 098279-68424

श्री मनु नायक से निम्न पते पर संपर्क किया जा सकता है-
पता : 4बी/2, फ्लैट-34, वर्सोवा व्यू को-आपरेटिव सोसायटी, 4 बंगला-अंधेरी, मुंबई-53
मोबाइल : 098701-07222

 

© सर्वाधिकार सुरक्षित

आगे पढ़िए  .  .  .  अगले गीत में

 

 

प्रस्तुत आलेख लिखा है श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी ने। भिलाई नगर निवासी, जाकिर जी पेशे से पत्रकार हैं। प्रथम श्रेणी से बीजेएमसी करने के पश्चात फरवरी 1997 में दैनिक भास्कर से पत्रकरिता की शुरुवात की। दैनिक जागरण, दैनिक हरिभूमि, दैनिक छत्तीसगढ़ में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं देने के बाद आजकल पुनः दैनिक भास्कर (भिलाई) में पत्रकार हैं। “रामेश्वरम राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता” का प्रथम सम्मान श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी को झांसी में दिसंबर 2004 में वरिष्ठ पत्रकार श्री अच्युतानंद मिश्र के हाथों दिया गया।


मोहम्मद जाकिर हुसैन
(पत्रकार)
पता : क्वार्टर नं.6 बी, स्ट्रीट-20, सेक्टर-7, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल : 9425558442
ईमेल : mzhbhilai@yahoo.co.in

 

पेश है आज का गीत …

बिहनिया के उ~गत सुरूज देवता~आ~आ~अ
तोरे चरणन~ के प्रभु जी~ मैं~ दासी हवव~

बिहनिया के उगत सुरूज देवता~
तोरे चरणन के प्रभु जी मे दासी हवव~
बीच नदिया म रही के पियासी हवव~
बिहनिया के उगत सुरूज देवता~
तोरे चरणन के प्रभु जी मे दासी हवव~
बीच नदिया म रही के पियासी हवव~

भोले शिवजी गजब के तैं दानी रहे~
मैया सीता तैं धरती के रानी रहे~
तोहरे छईयां म रही के उदासी हवव~
बीच नदिया म रही के पियासी~ हवव~

बिहनिया के उगत सुरूज देवता~आ~आ~अ

माता तुलसी सहीं भुइयां हरियर रहे~
तोरे दया के किरण मईयां घर-घर रहे~
मोर सपना न टूटे निंदासी रहंव~
बीच नदिया म रही के पियासी हवव~

बिहनिया के उगत सुरूज देवता~
तोरे चरणन के प्रभु जी मे दासी हवव~
बीच नदिया म रही के पियासी हवव
बिहनिया के उ~गत सुरूज देवता~आ~आ~अ


मीनू पुरुषोत्तम


गीतकार : डॉ.हनुमंत नायडू ‘राजदीप’
संगीतकार : मलय चक्रवर्ती
स्वर : मीनू पुरूषोत्तम
फिल्म : कहि देबे संदेस
निर्माता-निर्देशक : मनु नायक
फिल्म रिलीज : 1965
संस्‍था : चित्र संसार

‘कहि देबे संदेस’ फिल्म के अन्य गीत
दुनिया के मन आघू बढ़गे … Duniya Ke Man Aaghu Badhge
झमकत नदिया बहिनी लागे … Jhamkat Nadiya Bahini Lage
तोर पैरी के झनर-झनर … Tor Pairi Ke Jhanar Jhanar
होरे होरे होरे … Hore Hore Hore
तरि नारी नाहना … Tari Nari Nahna
मोरे अंगना के सोन चिरईया नोनी … Mor Angna Ke Son Chiraeaya Noni

 

यहाँ से आप MP3 डाउनलोड कर सकते हैं

 

गीत सुन के कईसे लागिस बताये बर झन भुलाहु संगी हो …;

22 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राहुल सिंह
    मार्च 07, 2011 @ 12:06:00

    बहुप्रतीक्षित सचित्र प्रस्‍तुति का स्‍वागत चन्‍द्राकर जी. जाकिर जी का काम समय के साथ और कीमती हो जाएगा.

    प्रतिक्रिया

  2. jai mishra
    मार्च 07, 2011 @ 17:53:43

    marvellous,
    what a sweet voice n touching lyrics.
    can’t imagine this is from 1965.
    Where is this female singer now?

    प्रतिक्रिया

  3. ajay royyuru
    मार्च 09, 2011 @ 11:28:21

    Zakir Hussain ji,
    Aapka blog bahut badhiya hai. It is a treasure trove of information. I really enjoyed reading it.
    I am looking for information on Pandavani. Do you know where I can get recordings? I found some of Teejan Bai’s on youtube, they are not complete, but nevertheless I get the sense that she is a terrific artist. Please let me know if you know of other recordings? Are these available for sale in Bhilai or Durg?
    What about artists before Teejan Bai? I recall, growing up as kids, hearing performances on loudspeakers from Ruabandha. Are there recordings of any artists of that period – 1970s, 1980s?
    -Ajay Royyuru, scientist, U.S.A.

    प्रतिक्रिया

  4. Chaitram Sahu
    मार्च 09, 2011 @ 11:29:41

    Thank you for your contribution to the Chhattisgarhi language , music,song, movie, culture and Lovers of this colour full land. It is really worth collection . I am a musician who appreciate your effort . Congratulations. My best wishes are with you. Keep it up .
    With Regard,
    C.R. Sahu
    G-65, Irrigation Colony, Shanti Nagar,
    Raipur. CG 492001
    Phone: 0771 2433133
    Mobile: +91 9424230796

    प्रतिक्रिया

  5. Dr G R Sinha
    मार्च 10, 2011 @ 19:52:40

    Surya Bhagwan and Mother earth never think taking rest and doing their duty very honestly, religiously. We should learn a very good lesson from this song.
    Congrats! Keep composing;
    Thanks to ZakirJi also for helping to promote this kind of things amidst us….
    DrGRSinha

    प्रतिक्रिया

  6. JITENDRA KATHRANI, Bhilai Steel Plant, Bhilai
    मार्च 12, 2011 @ 17:17:27

    Hi, Dear Jakirji,
    Your write up on Dr. Naidu

    प्रतिक्रिया

  7. JITENDRA KATHRANI, Bhilai Steel Plant, Bhilai
    मार्च 12, 2011 @ 17:23:44

    Hi, Dear Jakirji,

    I had gone through your write up on Dr Naidu, which is highly inspirable and appreciable and it is a good endevour on your part.
    Congrats ..Keep it up.

    With Regards.

    प्रतिक्रिया

  8. Dr. Vishesh Mohabey
    मार्च 12, 2011 @ 22:02:08

    This is indeed a very informative article written after a thorough research. It is an honest effort to bring out best of Chhattisgarh. The author must be greeted for his this unique work. Thanks to all those who are involved in this revolutionary project!

    प्रतिक्रिया

  9. dileep kumar sahu
    मार्च 14, 2011 @ 11:44:38

    Manu nayak film better movie hai ,esme ka geet bhi aachha hai es tarah ki film hamesha bante rahana chahiye ,esase hamare chhattisgarh ki culture are social parivesh all india mein pahuchega .thanku.

    प्रतिक्रिया

  10. raj verma
    मार्च 14, 2011 @ 20:28:45

    bahut hi shandar collection hai…..

    प्रतिक्रिया

  11. geeta sahu
    मार्च 18, 2011 @ 15:05:14

    i m not from chhattisgarh but …..i waz lookin 4 diz song 4 last 25 yrs..ur website waz quite lyk a miracle 4 me……gr8 work kepp itt upp..n keep informin abt cg f indstry lyk diz

    प्रतिक्रिया

  12. T.S.KORCHE
    अप्रैल 03, 2011 @ 11:20:43

    c.g. songs wo bhi purane original geet sunkar bahut maja aaya bahut achha site hai jakir bhai shukriya. T.S.KORCHE B.S.P. DALLIRAJHARA 9926460656

    प्रतिक्रिया

  13. rizwan khan
    अप्रैल 20, 2011 @ 16:10:26

    i liked it. rizwan khan gram- pondi kawardha (chhattisgarh)09893839321

    प्रतिक्रिया

  14. munna babu
    जून 02, 2011 @ 16:42:10

    dhanyavaad, es durlabh jankari k liye. aisi hi jankarion ki apekshaon sahit. . . munna babu

    प्रतिक्रिया

  15. GOPAL DAS
    जून 06, 2011 @ 16:05:26

    FILM TO BAHUT ACCHA HE , LEKIN DADA YEKHAR VIDEO CD HOTISH TE ACHH RAHIS

    प्रतिक्रिया

  16. SANJAYSAHUPOTIYAKALA
    अक्टूबर 02, 2011 @ 19:56:23

    ITNI ACCHI ANMOL JANKARI PAHLI BAAR PADANE KO MILA HAI . Realy Good Work.

    प्रतिक्रिया

  17. samay sharma
    जुलाई 19, 2012 @ 10:21:22

    bahut bahut dhanyawad !
    en parmparik geeto sunkar ek alg hi ehsas hota,sahi mayne me yahi 36gad ki anmol pahchan hai jiski tulna nahi ki ja sakti hai………

    प्रतिक्रिया

  18. Ramadhar Sahu
    अक्टूबर 04, 2012 @ 19:44:06

    date to yaad nahi fir bhi geet ke sunte hi kahi debe sandesh ke black and white picture ki kahani fir ak bar ghum gaya.ab ak bar picture ko dekhnaa.

    प्रतिक्रिया

  19. Rewatiraman Tarak
    दिसम्बर 16, 2013 @ 10:00:10

    mast

    प्रतिक्रिया

  20. rakesh तिवारी
    अगस्त 05, 2014 @ 17:24:51

    आज sudama भैया के संग गाना नुनेनमजा आगे

    प्रतिक्रिया

  21. keshav Sidar
    अक्टूबर 31, 2014 @ 15:34:51

    हम आज भी अपने हुनर मे दम रखते है,

    प्रतिक्रिया

  22. Chhaliya Ram Sahani 'ANGRA'
    दिसम्बर 03, 2014 @ 15:15:51

    Bihiniya ke uye suruj devta gana bada nik he au aise lagthe jaise sabke angana ma bagar ge he.

    प्रतिक्रिया

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