खुनुर खुनुर सुर में बाजे … Khunur Khunur Sur Me Baje

दाऊ मुरली चंद्राकर

दाऊ मुरली चंद्राकर जी

छत्तीसगढ़ सदियों से ही अपनी कलात्मक स्पर्शनियता और भावनात्मक जीवन शैली के लिए जानी पहचानी जाती रही है। यहाँ की धरती कई प्रतिभाशाली कलाकारों से भरी पड़ी है, यही कारण है की यहाँ की लोक कला और संस्कृति मनमोहक होने के साथ साथ मानविक दृष्टिकोण से सशक्त है। एक अलग राज्य बनकर छत्तीसगढ़ पुरे भारत के नक्शे में अपनी एक अलग पहचान रखती है, परन्तु एक सशक्त छत्तीसगढ़ की पहचान यहाँ के कलाकारों और माटी के लिए समर्पित पुन परतापी मनिस्यो को जाने बिना अधुरा सा लगता है। ऐसे ही कलापुरोधा में से एक है गीतकार दाऊ मुरली चंद्राकर जी। जितने भी पल मैंने दाऊ जी के सानिध्य में गुजारे है वो मेरी जिन्दगी के स्वर्णिम पलों में शामिल है, और उनकी यादें किसी हसी सफ़र के सामान हमेशा मेरा पीछा करती रहेंगी।

करिया के सुध म

तोर सुरता में धुनेल भैगे करिया
मोला अलिन-गलिन में सुनेल भैगे करिया
सरी मझानियाँ डहर लागे सुन्ना
पाछू परे बैरी छैहा डरेल भैगे करिया
सुध के बुध में गयेंव मैं नरवा तिर में
आभा मारथे चिरैया गुनेल भैगे करिया
नरवा झिरिया झुखागे मिठलबरा
मोला आंखी के आँसू पियेल भैगे करिया
निठुर मयारू जोड़ी होगे परबुधिया
कौने गली बिलमाये जोहे ल भैगे करिया
तिरिया के पिरिया में किरिया समागे
मुड़ बोझा होगे झौहाँ थेम्हेल भैगे करिया
जियत मरत के मयारू-मन-बोधना
जैसे तेल बिना बाती जरे ल भैगे करिया

गीतकार दाऊ मुरली चंद्राकर जी का जन्म अप्रैल 1931 में उनके पैत्रिक ग्राम औंरी में हुआ, पिता – स्व.दाऊ महादेव चंद्राकर तथा माता बेदीन बाई के छै पुत्रो में दाऊ जी तीसरे नम्बर के है, कला संगीत की तपोभूमि ‘अरजुन्दा’ में दाऊ जी का बचपन और यौवन बिता। वैसे तो हर कलाकार की कला भगवान की देन होती है, खैरागढ़ के सुप्रसिद्ध जगन्नाथ भट इनके गुरु थे जिनके सानिध्य में दाऊ जी ने “तबले” के साथ संगीत को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। इनकी संगीतमयी तपस्या का एक सशक्त स्वरुप यह भी है की दाऊ जी जितने अच्छा लिखते है उतने ही अच्छा गाते भी है। दाऊ जी ने सेक्टर-2 भिलाई स्टील प्लांट (दुर्ग) के कन्या शाला में बतौर संगीत शिक्षक कार्य किये, इस बीच वे शिक्षक नगर दुर्ग में निवासरत रहे।

दाऊ महासिंग चंद्राकर और रामचंद्र देशमुख जैसे कला पुरोधा के साथ काम करने वाले गीतकार दाऊ मुरली चंद्राकर जी के द्वारा लिखे गीत अपने ज़माने में काफी धूम मचाई है। लोक कला मंच “सोनहा बिहान” तथा “कारी” जैसे नाट्य मंचो को दाऊ जी ने अपनी गीत तथा संगीत से सराबोर किया है। यही कारण है की आज भी उनके गीत लोगों की जुबान पर चढ़ जाते है।

आतम गीता
(सोनहा बिहान में गाया गया)

अपन मरे बिना सरग नै दिखे, चाहे आवे भगवन हो
जांगर टांठ करे बर परही, तब हो ही सोनहा बिहान

दूध-घीव के नरवा बोहावे
सोनहा चिरैया देश कहावे
दया मया बिना काम न आवे
करम धरम बिन ज्ञान न आवे
तैहा के गोठ ला बैहा लेगे, होय बर परही सुजान हो
जांगर टांठ करे बर परही, तब हो ही सोनहा बिहान

गाँव सुखी तब देश सुखी हे
बात बात में लोग दुखी हे
कतको कमाथन पुर नई आवे
जांगर थकगे मन दुबरावे
सुख दुःख में मिल उठ बैठन, ले के हमर निशान
जांगर टांठ करे बर परही, तब हो ही सोनहा बिहान

सबो डहर ले खांव खांव
औ बाहिर भीतर रांव रांव
भाई खून के भाई प्यासा
दिखत हावे हमरे नासा
आतम गीता पाठ पढ़े बिना, मनसे होगे बेईमान
जांगर टांठ करे बर परही, तब हो ही सोनहा बिहान

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बांसगीत
(कारी में गाया गया)

धन तिरिया के जात मयारू
तिरिया चरित्तर भाग मरद के, का जाने मीठ लबरा
जस अपजस बिघना लपटागे, मोर लुगा के अंचरा
मयारू धन तिरिया…

मरुवा मयारू नाव गोदायेंव, गाल गोदायेंव गोदना
कुहकू सेंदुर मांग अमर हे, हरियर चुरी गहना
मयारू धन तिरिया…

लाज लहर के पियेंव मतौना, बरबस रूप सिंगारेवं
का मोहनी मुड़ मोहना डारे, जिनगी जनम सब हारेवं
मयारू धन तिरिया…

साँस तेल जरे आस के बाती, तन माटी के दियना
अंधियारी मा होगे अंजोरी, दुखयारी के अंगना
मयारू धन तिरिया…

करिया छैहा चोर भरमथे, अबला जन के मोला
धन करिया तोर पंडरा छैहा, करिया जानेव तोला
मयारू धन तिरिया…

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लोरी
(कारी में गाया गया)

सुत जबे सुत जबे लल्ला रे सुत जबे न
एसे मजा के रे बेटा मोर पलना मा सुत जबे
सपना के रानी रे बेटा मोर निदिया में आही न
मुन्ना राजा बर भैया रे पलना सजाही न
चंदा के पलना रे भैया मोर रेशम के डोरी न
टिमटिम चमके रे बेटा मोर सुकवा चंदैनी न
गजरा गुंथाये रे लल्ला मोर चम्पा चमेली न
पलना झुलाही रे बेटा मोर सखी अऊ सहेली न
ऐसे के बेरिया म भैया मोर रानी जब आही न
लोरी सुना के रे बेटा मोर तोला सुताही न

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सोर संदेश
(कारी में गाया गया)

हो~अ~रे सुवना कहिबे धनिल गोहराय
लोखन होगे सोर संदेस नोहर होगे
परछी म परछो लेवाए रे सुवना
तन मौरे मन मौहा महक मारे
लुगरा के लाली लुलुवाय रे सुवना
कुहकथे कोयली करेजा हुदक मारे
आँखी के कजरा बोहाय रे सुवना
सैता के सुतरी सांकुर भइगे संसो म
सैया सैया साँस सुसुवाय रे सुवना
मन रंग कुसुम कुसुम रंग धनि होगे
आंखिच आँखी म समाय रे सुवना
भूलन खुंदा के भुलागे बछर होगे
धनि लाबे संग समझाय रे सुवना

इनकी एकमात्र प्रकाशित छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह “मुरली के धुन” का छत्तीसगढ़ी साहित्य में अपना एक अलग स्थान है। जो हमारे जैसे नवगीतकारों कलाकारों को प्रेरणा देती रहेगी। दाऊ जी का व्यक्तित्व स्पष्टवादी, निर्भयता और मस्तमौला पुरुष का रहा है। भावनात्मक जीवन शैली से परिपूर्ण दाऊ जी की रचनाओं में श्रृंगार रस के साथ साथ राग विराग की छवि भीतर तक छूती है।

किसान देवता

जागो-जागो हे किसान अब तो होगे बिहान
धरती माता तोला गोहरावे अरज करे तोर सुरुज भगवान

डेहरी में तोर बिहिनियां खड़े हे
खेत में तोर मंझनिया अड़े हे संगी
लहू पसीना ल खेत में भर के
धरती के करो हे सवांग ||जागो-जागो ||

हीरा मोती के जोड़ी खड़े हे
धोवन पसिया बिना अड़े हे संगी
चिरहा निगोटी कुरता पहिर के
कर लेबे तैंहा सवांग ||जागो-जागो ||

तोरेच कमई मा सबो भुकरत हे
बनियां बेपारी येहूँ डकरत हे
बीता भर पेट के खातिर तोला
विधि ह गढ़ दिस किसान ||जागो-जागो||

जियत भरके खटिया गोरसी
चोंगी माखुर मा निपटे रे बरसी
छाती में तोर जम राजा अस
चढ़े हावे संझा बिहान ||जागो-जागो||

दाऊ जी के गीतों की अपनी एक अलग बानगी तथा भीतर तक उतरने की ह्रदय स्पर्शी शैली है। जो सुनने वाले को भाव विभोर कर देती है। दाऊ-जी गीत लिखने के साथ साथ अपने द्वारा बनाई गयी धुनों पर गाते भी है। दाऊ जी के साथ समय गुजरना किसी ठंडी छाया की शांति से कमतर नहीं लगता। मैं शुरू से ही दाऊ जी के गीतों का कायल रहा हु तथा उन्हें अपना प्रेरणा श्रोत गुरु मानता हूं। दाऊ जी प्रसिद्ध रंगकर्मी रामहृदय तिवारी जी के पहले हिंदी नाटक ‘अँधेरे के उसपर’ के गीतकार तथा संगीत निर्देशक रह चुके है।

बसंत प्रिया

खार खार बगियागे परसा के फुल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे ?

आमा मौरे महके नदिया कछार म
कारी कोयली कुहके आमा के डार म
टिहकी चिरैया के टिहकथे सुल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे

मिरगिन मस्मोटी म खारखार दौड़गे
बूंद बूंद मधुरस के तार तार चुहके
जंगल मंगल झूले झुलना के झूल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे

पाना पागी ल फेंक गुलमोहर झौरे
जी भर के आस धरे सेम्हर ह सौरे
सुसुवाके तन होगे काटा बबूल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे

कंवला अऊ खोखमा के पाँखी छतरागे
कलमुहा भौरा के मन रतियागे
झुमरी तरैया म चढ़गे का चुल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे

पानी पिरित रंग भंग घोरियागे
अबीर गुलाल के मती छरियागे
मोटियारी मेंहंदी माहौर माते धुल रे
तबले नई आये जोड़ी का होगे भूल रे

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जिवलेवा

जिवलेवा होगे ऐ बहिनी सोलहो सिंगार
ये मौसम के बछर उमरिया होवथे खुंवार
पर्सा फुल ह चबढी चबाथे, चिढ चढ़ाथे सेम्हर
बिजराथे गुलमोहर मेंहंदी हदियाथे हरदी केसर
जिवलेवा होगे रे, जिवलेवा होगे हाय! राम
ये छत रंगीया उमर चुनरिया होगे तार तार
जीव लेवा होगे ऐ बहिनी सोलहो सिंगार

दाऊ जी के गीतों ने छत्तीसगढ़ी लोक कला को अत्यंत समृद्ध रूप दिया है। इनके गीत मौलिकता और विविधता के लिए प्रसिद्ध है। कला अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होता है, इस माध्यम का उपयोग करने के लिए बड़ी तपस्या की आवश्यकता होती है। दाऊ जी के गीतों में वो तपस्या और साधना स्वमेव झलकती है। दाऊ जी अपने ज़माने के गीतकारों में प्रतिष्ठित और सम्मानित है, अपनी तपस्या और कठोर साधना के कारण ऐसी ही सपूतों को जन्म देकर छत्तीसगढ़ महतारी अपनी कोख को धन्य मानती है।

जागे

माटी जागे मिहनत जागे, जागे लहू जवान
गाँव गाँव में जोत जागे, हाँथो हाँथ निशान

जिव जांगर ल थको संगी
तपसी कमिया नरक भोगथे
कोलिहा बघवा खाल ओढ़ के
कपटी बैठे सरग भोगथे

आज ठगागे श्रम के देवता, माटी-पुत किसान
गाँव गाँव में जोत जागे, हाँथो हाँथ निशान

मरके सरग घलो नै दिखे
मिहनत करके मरिन किसान
हक विरता वर जीना मरना
कहिके थकिन गीता कुरान

धरती मांगे लहू पसीना, जांगर के बलिदान
गाँव गाँव में जोत जागे, हाँथो हाँथ निशान

लूटे बर छत्तीसगढ़ बनगे
दिन दूना चमके वेपार
मुंह के कौंरा गिरवी धरागे
कबले सहिबो अत्याचार

बन धर बलकरहा जागे, भुइयां के भगवान
गाँव गाँव में जोत जागे, हाँथो हाँथ निशान

दाऊ मुरली चंद्राकर के गीतों का प्राणतत्व है – भाव प्रवणता। जो इनके गीतों की अविछिन्न परम्परा को उजागर करती है। दाऊ जी छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृती के लिए पूर्ण रूप से समर्पित रहे है। इनके गीत सांस्कृतिक जागरण के प्रतिक है। दाऊ जी के गीतों की शैली बहुत विरल है जिसमे संगीत की अविरल धारा बहती है। इनके गीत अंचल के किसानों की पीरा, गाँव के दुख-दर्द और छत्तीसगढ़िया पन की झलक दिखाते है जो अंचल के लिए अमूल्य निधि के सामान है।

दुलौरिन के मया

मोर जोरे पिरित ला छोड़ाई लेगे सैया
कोख म पयेव, कोरा न मया पायेव
दाई ददा के जोरा म मया पायेव
मड़वा म घुमरी घुमाई लेगे सैया
मोर जोरे पिरित ला छोड़ाई लेगे सैया

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गवना

तिरिया जनम जी के काल
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

दाई के कोख, ददा के कोरा सुसकथे
बबा के खंधैया गोहराय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

संग-संगवारी फुलवारी सुसक रोथे
अंचरा ल, कांटा ओरझाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

घाट घठौन्दा नदी नरवा करार रोथे
पथरा के, छाती फटजाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

छोर के छंदना मया के डोरी ऐसे बांधे
खोर गली, देखनी हो जाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

हाथ के मेहँदी सेंदुर मांग कुहकथे
नथनी, नजर लग जाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

सैया के छैहा, बने गुईया एक पैया रेंगे
पौठा, डहर बन जाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

सैया के नांव, पैया म पैरी ल पहिरे
बैरी के, घांठा पर जाय
निठुर जोड़ी गवना लेवाए

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छंड़वे

येदे जिनगी जनम होगे हांसी वो दाई मोर
रोई रोई काटेंव दिन राती

ननपन में मुंह देखनी होगे, होगे मंगनी जचनी
मड़वा खाल्हे भांवर गिंजरेव, चंदा सुरुज दुई साखी वो
रोई रोई काटेंव दिन राती

पीरा बने हिरदे में समागे, काया जरे जस बाती
सोर संदेस अविरथा होगे, कागज कोर पाती वो
रोई रोई काटेंव दिन राती

मैके ससुरे मयारू नंदागे, खोजे काकर छैंहा
ताना में तन छलनी होगे, मोटियारी एहँवाती
वो दाई मोर रोई रोई काटेंव दिन राती

दाऊ-जी के गीत सुनने वाले को तुरन्त किसी अपरिभाषित व्यक्तित्व का अहसास कराती है, विशेष सांस्कृतिक दृश्य उभरने लगता है, जीवन के विविध इन्द्रधनुषी छाटाओं के साथ ही आल्हादकारी, संगीतमयी, सांस्कृतिक मनोरंजन, सहकारिता, मया पिरित की भावना का दर्शन होता है, यही कारण है की दाऊ जी के गीत केवल मनोरंजन का साधन न होकर सांस्कृतिक धरोहर सी प्रतीत होती है। घर आंगन, खेत-खलिहान, मंदिर चौपाल, हाट बाजार, मेला मड़ाई, बाग-बगीचा ऐसी कौन सी जगह नहीं है जहा दाऊ-जी के शब्दों ने दस्तक न दिए हो, गाँव के बाहर चरवाहे की बंसी की तान हो या कुंए में पानी भरती ग्राम बालाओं के बिच हंसी ठिठोली, प्रेम में डूबी प्रेयसी की पीरा हो या खेतों में झूमते फसलो को देखकर बौछाये किसान का प्रफुलित मन, दाऊ मुरली चंद्राकर जीवन के हर पहलु को अपने अंदाज में अपने गीतों के माध्यम से जिया है।

फागुन मास

है रे फागुन मास हो फागुन मास
कारी कोयलिया ताना मारे
भेद जिया के खोले रे
बंजर में बगियाये सेम्हर सैता ल डोलाथे
सुन्ना म सैया के सुरता मैंता ल भरमाथे

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जौंजर मोटियारी

सावन महिना मन भाये
की आमा डारा झुलना बंधाये
मोटियारी मनभा दुलौरिन मिलापा
रम्भा रधिया रतनी पदमा परागा
पीवरी धोवाय बर आये
की भौजी देखे ननदी लजाये
सावन महिना मन भाये

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मयारू ल संदेश

ऐठी मुरी पागा मखमली कुरता
हिचकी म समागे मयारू सुरता
दहरा के मछरी के भाठा म मोल
चट्काही मिठलबरा होगे अनमोल

चाउर चिला बंगाला चटनी
दही बोरे बरा बैरी बर मुह देखनी
पापर बिजौरी हे पाकी पकवान
घिवहा सोहारी हे तेलहा अथान

टिहकी चिरैया के लेवथे परान
पलका बिछौना राखे हे बीरो पान
पानी पिरितिया के लेखा न लिखान
चोरो-बोरो मया होगे चटनी चटान

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मधुबन के छैला बाबू

ऐ छैला बाबू आतो आतो आना
ऐ छैला बाबू एती एती आना
छैला बाबू आते जाते रिबे मोर गाँव
डोंगरी के ओपार मौहारी भाठा हे
झुंझकुर मयारू मौहा छाव छाँव, छैला बाबू
छैला बाबू आते जाते रिबे मोर गाँव

मन के मिलैया उहा कतको मोट्यारी हे
दिल के देवैया उहा कतका दोसदारी हे
लहुट के आथे उलटो पांव पांव, छैला बाबू
छैला बाबू आते जाते रिबे मोर गाँव

कोनो कैथे राधा मोला कोनो कैथे रंगरेली
कोनो कहिथे बाधा मोला, कोनो कहिथे बेलबेलही
चेलिक मन लेथे रधिया नांव नांव, छैला बाबू
छैला बाबू आते जाते रिबे मोर गाँव

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भौजी के गोठ

देखे देखे देवर बाबु! तोर भैया के चाल
लिखरी लिखरी गोठ में मोला घर ले देथे निकाल

बरे बिहाई मडवा गिजरेव, देवता धामी मानेव
दाई ददा के छैहा बिसरेव, गांठ जोर मैं आयेव

का बहिरासु घर लिस वोला, बहिरी बहिरी रहिथे
बारे बिहाई औ तेकर सेती, मोला अतका तपथे

का बात बर कहि देंव वो दिन, घर ले वोहा परागे
खपचलहा तोर भाई ओसने, कतको कहव नै लागे

जुवा चित्ती मद मौहा औ सकल कर्म में हावे
निच्चट बेहडूवा बनगे वोहा रात रतिहा नै आवे

काम कमई में नैये ठिकाना, कहे में तनतनाथे
परबुधिया ल का कहिबे, लौठी बेड़गा उठाथे

भैसा अस बर्राय वो तो चूरे पके में आथे
रिस रांड के गोठ बात म, उत्ता-धुर्रा ठठाथे

तोर भाई ला कहिते बाबू, जनम झन गंवावे
इही जनम में दौ लेवे मोला, फेर जनम नई पावे

सहत भर ले सहत हव बाबू, नई बिगड़े मोर चाला
रांका राज के मैं सतवंतिन, परे हवय मोर पाला

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छत्तीसगढ़ी बोली के महिमा

एकर महिमा ल सुन रे भैया, गा के तोला समझावौ हो
ऐसन छत्तीसगढ़ के बोली, के भेद ल कैसे बतावौ

गौरा गुडी के गीत, सुन जिया भहरा जथे
सुवा पड़की के राग, थपडी म मन ह बोधा जथे
खार ददरिया के ताना ल सुनके, रददा रेंगैया लजावे हो
ऐसन छत्तीसगढ़ के बोली…

अलगोजवा के ताना ल सुन के समधिन ह भड़क जथे
लगथे छाती में बाण आनी बानी के भड़त रहिथे
अंतस के कोनो गम नई पावे, मने मन मुसकाव हो
ऐसन छत्तीसगढ़ के बोली…

नरवा तरिया के गोठ, सुन सुन रददा पठल जथे
मैके ससुरे के गोठ सुन सुन जी ह मचल जथे
ऐसन बोली के गढ़ बर भैया, जम्मो के मन रधियावे हो
ऐसन छत्तीसगढ़ के बोली…

कुकुर कौंवा नइ बिसरे बाबू, अपन बोली अउ बात ल
जम्मो के मरजाद तोपाय हे, बोली के पुन परताप म
अमली के पेड़ म अमली फरथे, आमा कैसे देखावों हो
ऐसन छत्तीसगढ़ के बोली…

इनके गीत कंठ से निकलते ही अत्मिक सुख का अनुभव कराती है। वर्तमान के संग अतीत की स्मृतयो में गोते लगवाती है, इनके गीतों की स्वर लहरिया हमें कुछ नया और नया करने के लिए प्रेरित करती है, छत्तीसगढ़िया-पन की मार्मिक अभिव्यंजना का चित्रण इनके गीतों में मिलता है, इनके गीतों में छलकती मस्ती, प्रेम-अनुराग, सौन्दर्य, लालित्य, श्रृंगार की बहुलता और पसीने के बूंदों की महक सब-कुछ खोकर भी जीवन पर्यंत मुस्कुराने की परंपरा कायम की है। दाऊ मुरली चंद्राकर जी एक ऐसे शख्सियतो में शुमार है जो अपनी बात मनवाने के लिए जाने जाते रहे है, गलतियों पर खखुवाने वाले इस अवधूत के गीतों की शब्दों में गजब की कसावट है इनके गीतों की बानगी लोकगीतों के काफी करीब है जिसमें स्वरों का ऐसा रंग चड़ा है जो सुनने वाले को स्वयं गुनगुनाने के लिए बाध्य करता है। बादशाही फितरत के धनि इस शब्दों के जादूगर की गीत शैली सुनने वाले को विशेष आनंद से सराबोर कर देती है।

येदे जिनगी के नैहे ठिकाना, लहर गंगा ले लेतेंन जोड़ी
पुन्नी के मेला म जातेन, दुकेल्ला की कर लेतेंन गंगा स्नान
ले लेतेंन केला चड़ा देतेंन भेला, मना लेतेंन भोला भगवान
काया माया के नैये ठिकाना, मेला ठेला देख आतेंन जोड़ी
येदे जिनगी के नैहे ठिकाना, लहर गंगा ले लेतेंन जोड़ी
लहर गंगा ले लेतेंन ना

एमन दास मानिकपुरी मुझे वो दिन आज भी याद है जब दाऊ मुरली चंद्राकर जी सेवानिवृत होने के पश्चात अपने पैत्रिक गाँव औरी में विश्राम करने के लिए आये उस ज़माने में दाऊ जी की कला साधना लोकप्रियता की चरम सीमा पर थी चूँकि मेरा घर उनके घर से लगा हुआ है और मेरे दादा जी दाऊ जी के काफी अच्छे मित्रो में थे इस कारण मेरे यहाँ इनका आना जाना लगा रहता था कभी-कभी मेरे घर के एक कमरे में दाऊ जी अपनी टोली के साथ डट जाते और खूब गीत संगीत का कार्यक्रम चलता। दाऊ जी से मेरा अभी संपर्क उस इस्तर का नहीं बन पाया था जो आज है। कार्तिक का महिना था दाऊ जी घर के बाहर खुर्सी पर बैठे अख़बार के साथ बीडी और धुप का आनंद ले रहे थे। मै वही से गुजरा तो दाऊ जी ने मुझे बुलाया और गाड़ी निकालने के लिए चावी मेरे हाथ में थमा दी। उनके सुबह-शाम सैर की आदत से मैं भलीभाती परचित था। उस दिन मुझे पहली बार दाऊ जी के साथ घुमने का मौका मिला और यह सिलसिला रोज की दिनचर्या बन गयी। तभी से मै दाऊ जी के सानिध्य में आया, मै जब भी उनसे मिलता तो गीत संगीत की बातें होती, कला की चर्चा में डूब जाते। कब समय गुजरता पता न चलता था। उनके बातों से मै इतना प्रभावित हुआ की उनके सानिध्य में मेरी कविता लिखने की रूचि ने मुझे छत्तीसगढ़ी गीत प्रेमी व गीतकार बना दिया।

आलेख व संकलन : श्री एमन दास मानिकपुरी
सम्पर्क : औरी, भिलाई-3 दुर्ग छत्तीसगढ़ ।
मोबाईल : 78289 53811
ईमेल : amanmanikpuri@rediffmail.com

 

 

आइए सुनते हैं दाऊ मुरली चन्द्राकर का लिखा गीत … खुनुर खुनुर सुर में बाजे

खुनुर खुनुर सुर में बाजे

 

खुनुर खुनुर~
खुनुर खुनुर सुर में बाजे
चुटकी चटक बोले रे बैरी पैरी ल
छी
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
खुनुर खुनुर~

रुनझुन रुनझुन सुनगुन सुनगुन
थिरक थिरक के बोले
थिरक थिरक के बोले
रुनझुन रुनझुन सुनगुन सुनगुन
थिरक थिरक के बोले
थिरक थिरक के बोले
मांदर थाप थाप सुन नाचे
मांदर थाप
मांदर थाप थाप सुन नाचे
नवरस नवरंग घोले रे बैरी पैरी ल
छी
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
खुनुर खुनुर~

कैसन हे तोर सांचा खांचा
कैसन हे सिरजैया
कैसन हे सिरजैया
कैसन हे तोर सांचा खांचा
कैसन हे सिरजैया
कैसन हे सिरजैया
चाल चलत कनिहा मटके सखि
चाल चलत
चाल चलत कनिहा मटके सखि
ताना मारे ठोले रे बैरी पैरी ल
छी
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
खुनुर खुनुर~

सुर के बही धनी सुर बैहा
सुर के सुर म बोले
सुर के सुर म बोले
सुर के बही धनी सुर बैहा
सुर के सुर म बोले
सुर के सुर म बोले
अवघट घाट-बाट नइ चिन्हे
अवघट
अवघट घाट-बाट नइ चिन्हे
संग संगवारी डोले रे बैरी पैरी ल
छी
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
खुनुर खुनुर~
खुनुर खुनुर सुर में बाजे
चुटकी चटक बोले रे बैरी पैरी ल
छी
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
पैरी ल चिटको सरम नइ लागे या
बैरी पैरी ल चिटको सरम नइ लागे
चिटको सरम नइ लागे
चिटको सरम नइ लागे
चिटको सरम नइ लागे


गायन शैली : ?
गीतकार : मुरली चन्द्राकर
रचना के वर्ष : ?
संगीतकार : ?
गायन : श्रीमति जयंती यादव अउ साथी
संस्‍था/लोककला मंच : सोनहा बिहान

 

यहाँ से आप MP3 डाउनलोड कर सकते हैं

गीत सुन के कईसे लागिस बताये बर झन भुलाहु संगी हो …

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